‘इंडिया से भारत’ की नई तस्वीर गढ़ने की कोशिश, हुनर और स्वावलंबन से बदल रही तस्वीर
‘इंडिया से भारत’ की नई तस्वीर गढ़ने की कोशिश, हुनर और स्वावलंबन से बदल रही तस्वीर
मीरजापुर, 18 अगस्त । 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस बीत चुका है। तिरंगा उतार दिया गया, देशभक्ति के गीतों की गूंज थम गई और आजादी की गाथा सुनाने वाले मंच भी शांत हो गए। लेकिन आजादी का अर्थ केवल एक दिन तिरंगे को सलाम करने तक सीमित नहीं है। इसका असली अर्थ तब सामने आता है, जब व्यक्ति सम्मान, श्रम और आत्मनिर्भरता की राह पकड़ता है। जेल की सलाखों के पीछे गूंजती हथकरघे की खटखट इसी ‘आजादी के बाद की आजादी’ की कहानी कहती है।
उत्तर प्रदेश निर्यात संवर्धन परिषद के सदस्य, कालीन एवं दरी सेक्टर के प्रतिनिधि, विक्रम कार्पेट्स के सीईओ, हथकरघा हस्तशिल्प निर्यातक कल्याण संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अटल सम्मान-2024 से सम्मानित ऋषभ कुमार जैन ने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से विशेष बातचीत में कहा कि कभी भारत की पहचान गांवों, कुटीर उद्योगों, चरखे की घरघराहट, करघे की खटखट और मिट्टी से जुड़ी जीवनशैली से होती थी। समय बदला तो गांव पीछे छूटते गए और हाथ का हुनर मशीनों के सामने कमजोर पड़ता गया। अब प्राचीन भारतीय ज्ञान, कौशल और स्वावलंबन को आधुनिक बाजार व तकनीक से जोड़कर भविष्य का भारत गढ़ने की कोशिश हो रही है। जैन संत आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज की प्रेरणा से चल रहा हथकरघा अभियान इसी सोच का उदाहरण है। उद्देश्य है कि गांव के हाथ को काम, हुनर को सम्मान, परिवार को आत्मनिर्भरता और परंपरा को अगली पीढ़ी मिले।
विरासत से विकास तक
ऋषभ कुमार जैन के अनुसार पिछले एक दशक में इस अभियान ने 10 राज्यों में 68 से अधिक हथकरघा केंद्रों का नेटवर्क खड़ा किया है। 4,500 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण के बाद रोजगार से जोड़ा गया है और करीब 2,700 हथकरघे सक्रिय हैं। 500 से अधिक घर-घर हथकरघा और 40 सूक्ष्म ग्राम केंद्र इस प्रयास को गांवों की चौखट तक पहुंचा रहे हैं। इसका असर रोजगार के साथ महिलाओं की आर्थिक मजबूती, युवाओं के कौशल और गांव के हुनर को बाजार से जोड़ने के रूप में दिखाई दे रहा है।
करघे की खटखट में आत्मनिर्भरता
कभी करघा गांव की अर्थव्यवस्था का केंद्र था। कपड़ा केवल बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका, स्थानीय कला और सामाजिक पहचान था। औद्योगिकीकरण और बदलती उपभोक्ता संस्कृति ने इसे कमजोर किया। अब उसी करघे को आधुनिक डिजाइन, प्रशिक्षण, विपणन और बाजार से जोड़ने की कोशिश है। डिजाइन व उत्पाद विकास, व्यवसाय प्रबंधन, ब्रांड निर्माण, संवाद और नेतृत्व जैसे कौशलों के जरिए कारीगर को मजदूर से उद्यमी बनाने पर जोर है।
जेल की सलाखों के पार उम्मीद
इस बदलाव की सबसे अलग तस्वीर जेलों में दिखाई देती है। ‘अपनापन’ के माध्यम से बंदियों को हथकरघा प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ने का प्रयास चल रहा है। वर्तमान में नौ जेलों में 305 से अधिक बंदी हथकरघा कार्य से जुड़े हैं, जबकि 250 से अधिक प्रशिक्षण ले चुके हैं। उद्देश्य केवल कौशल देना नहीं, बल्कि बंदी को दंड की मानसिकता से निकालकर श्रम, अनुशासन और आत्मसम्मान से जोड़ना है, ताकि सजा पूरी होने के बाद वह सम्मानजनक जीवन शुरू कर सके।
महिलाओं से अगली पीढ़ी तक
घर-घर हथकरघा ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक ताकत का माध्यम बन रहा है। घर की जिम्मेदारियों के साथ वे उत्पादन में भागीदारी कर आय अर्जित कर सकती हैं। कई परिवारों की आय में इससे वृद्धि हुई है। साथ ही, परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ज्ञानोदय विद्यालयों के कक्षा छह से 12वीं तक के विद्यार्थियों को व्यवहारिक हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रशिक्षण से जोड़ने की परिकल्पना है। लक्ष्य केवल कारीगर बनाना नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और स्वावलंबन समझने वाली पीढ़ी तैयार करना है।
भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था
स्थानीय उत्पादन भारत की पुरानी व्यवस्था का हिस्सा रहा है। आज दुनिया टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन की ओर लौट रही है। प्राकृतिक रेशे, कम ऊर्जा वाला उत्पादन, स्थानीय कच्चा माल और टिकाऊ जीवनशैली हथकरघे को भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना सकते हैं। ‘वोकल फॉर लोकल’ से आगे बढ़कर यह स्वदेशी उत्पादन की नई आर्थिक संस्कृति बना सकता है।
गांव से वैश्विक बाजार तक, 5,000 नए हाथों को रोजगार का लक्ष्य
अब चुनौती उत्पाद को गांव से वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की है। डिजाइन, डिजिटल मार्केटिंग, ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स और आधुनिक प्रबंधन का प्रशिक्षण मिलने पर करघे का उत्पाद स्थानीय हाट से निकलकर देश और दुनिया के बाजार तक पहुंच सकता है। आने वाले वर्षों में 5,000 ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को आजीविका से जोड़ने का लक्ष्य है। इसके साथ नए ग्रामीण व कारागार प्रशिक्षण केंद्र, घर-घर हथकरघा, डिजाइन-विपणन प्रशिक्षण, क्लस्टर विकास और लुप्त होती बुनाई तकनीकों का दस्तावेजीकरण भी प्रस्तावित है। ‘इंडिया से भारत’ की यात्रा केवल शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि नजरिए का बदलाव है। विकास की कसौटी बड़े शहर और बड़ी फैक्ट्री के साथ गांव का आत्मविश्वास, कारीगर का सम्मान, महिला की आर्थिक स्वतंत्रता, युवा का कौशल और प्रकृति से संतुलन भी होना चाहिए।