पत्नी को ₹3,000 मासिक भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति-पत्नी दोनों की याचिकाएं खारिज कीं
बलिया के पारिवारिक न्यायालय के फैसले में हाईकोर्ट ने नहीं किया हस्तक्षेप, कहा- पत्नी की स्वतंत्र आय भरण-पोषण से पूरी तरह वंचित नहीं करती, लेकिन राशि तय करने में अहम कारक है
प्रयागराज, 09 अक्टूबर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बलिया के पारिवारिक न्यायालय द्वारा पत्नी को दिए गए 3,000 रूपये प्रतिमाह के भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखते हुए पति और पत्नी, दोनों की आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कर दीं। न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय ने यह आदेश दिया।
बलिया की शारदा देवी ने अपने पति काशी नाथ तिवारी से धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण मांगा था। प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, बलिया ने 28.जून.2022 को भरण-पोषण वाद में आंशिक रूप से आवेदन स्वीकार कर 3,000 रूपये प्रतिमाह मंजूर किए थे। इसके खिलाफ पत्नी ने राशि बढ़वाने के लिए और पति ने आदेश रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। दोनों की सुनवाई साथ हुई।
पांच बच्चों (दो बेटे, तीन बेटियां) के बालिग और अलग-अलग बस जाने के बाद वह अकेली रह गई हैं। उनका कहना था कि पति बीटीसी प्रशिक्षण केंद्र के सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, 40,000 रूपये मासिक पेंशन पाते हैं और खेती से लगभग 60,000 रूपये प्रतिमाह कमाते हैं। इसके बावजूद वे खर्च नहीं देते और खेत जोतने भी नहीं आदेते, जिससे वे गरीबी में जीवन बिता रही हैं।
पति ने विवाह स्वीकार किया, लेकिन पारिवारिक कलह के लिए छोटी बहू का हस्तक्षेप बताया। उन्होंने पत्नी के नाम आराजी संख्या 327 (0.0160 हेक्टेयर) खरीदी, जिसे पत्नी ने बहू के नाम गिफ्ट डीड कर दिया। आराजी संख्या 35 और 36 पत्नी के नाम खरीदी गईं, जिन्हें उन्होंने रूपये 13 लाख में बेचकर छोटे बेटे के नाम निर्माण सामग्री की दुकान खोली और बेटे-बहू के लिए ट्रक खरीदा।
75 लाख रूपए से अधिक खर्च कर बनवाए मकान से पत्नी को 10,000 रूपये मासिक किराया मिलता है।
खतौनी और पंजीकृत गिफ्ट डीड जैसे दस्तावेजों से सिद्ध है कि पत्नी के पास किराये और संपत्ति बिक्री से आय के स्वतंत्र साधन हैं।
कोर्ट ने कहा यह आवारागर्दी और अभाव रोकने का सामाजिक न्याय का उपाय है, पति-पत्नी की आय बराबर करने का नहीं। कहा पत्नी की स्वतंत्र आय भरण-पोषण से पूरी रोक नहीं, पर राशि तय करने में अहम कारक है। बुजुर्ग पति की सीमित आर्थिक क्षमता के बावजूद, कई दशकों की विवाहिता और वृद्ध पत्नी के प्रति उनका दायित्व खत्म नहीं होता।
अदालत ने कहा कि जीवन-निर्वाह का मतलब पति के घर जैसा जीवन-स्तर है।
अदालत ने माना कि पत्नी की बड़ी वृद्धि की मांग और पति द्वारा दायित्व से पूरी तरह इन्कार, दोनों अनुचित हैं। 3,000 रूपये प्रतिमाह की राशि संतुलित है और पारिवारिक न्यायालय के आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या विकृति नहीं है। इसलिए दोनों पुनरीक्षण खारिज कर दिए गए और 28.जून.2022 का आदेश यथावत रखा गया।