42 साल पुराने मामले में 81 वर्षीय मुरली सिंह बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की तीन साल की सजा

कानपुर की कॉटन मिल में नशीली गोली खिलाने के आरोप में हुई थी सजा, हाईकोर्ट ने कहा- अभियोजन के साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं

42 साल पुराने मामले में 81 वर्षीय मुरली सिंह बरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की तीन साल की सजा

प्रयागराज, 09 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कानपुर के लक्ष्मी रतन कॉटन मिल से जुड़े करीब 42 साल पुराने मामले में आरोपी मुरली सिंह की सजा रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य धारा 328 आईपीसी के तहत दोष सिद्ध करने के लिए अपर्याप्त हैं।

अभियोजन के अनुसार, 20/21 जनवरी 1984 की रात करीब 1:30 बजे मिल में ड्यूटी के दौरान मुरली सिंह ने सुपरवाइजर चंद्रिका प्रसाद मिश्र और टाइमकीपर श्यामजी निगम को ताकत बढ़ाने वाली "गोली" खाने को कहा। श्यामजी ने मना कर दिया, लेकिन चंद्रिका प्रसाद ने गोली खा ली, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। थाना काकादेव में धारा 328 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज हुआ। 13 दिसंबर 1985 को कानपुर नगर के 9वें अपर सत्र न्यायाधीश ने मुरली सिंह को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। उल्टी का नमूना घटना के करीब डेढ़ माह बाद 5 मार्च 1984 को फॉरेंसिक लैब भेजा गया। इस बीच नमूना कहां और किसकी अभिरक्षा में रहा, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

पीड़ित का पहली बार इलाज करने वाले डॉक्टर और नमूने की जांच करने वाले विशेषज्ञ, दोनों में से किसी की भी ट्रायल में गवाही नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि पीड़ित की तबीयत आरोपी द्वारा दिए गए पदार्थ से बिगड़ी। शिकायतकर्ता ने खुद स्वीकार किया कि उसकी आरोपी से कोई दुश्मनी नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि अन्य कमियों को देखते हुए मकसद का न होना महत्वपूर्ण हो जाता है।

उच्चतम न्यायालय का हवाला: न्यायालय ने जोसेफ कुरियन फिलिप जोस बनाम केरल राज्य (1994) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि धारा 328 में आरोपी द्वारा जहरीला या नशीला पदार्थ देने का प्रत्यक्ष, विश्वसनीय और ठोस सबूत जरूरी है।

- संदेह का लाभ: कोर्ट ने कहा कि विरोधाभास या संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को मिलना चाहिए।

बचाव पक्ष की दलीलें

एमिकस क्यूरी प्रदीप कुमार राय ने कई आधार रखे: उल्टी की कोई फर्द (जब्ती मेमो) नहीं बनी, घटना का समय एफआईआर (1:30 बजे) और गवाही (12:45 बजे) में अलग-अलग है, और धारा 313 सीआरपीसी के बयान में फर्द के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि घटना से दो दिन पहले आरोपी का एफआईआर के लेखक तेज सिंह यादव से विवाद हुआ था और उसने 19 जनवरी 1984 को कंपनी में लिखित शिकायत दी थी, जिसकी पुष्टि बचाव गवाह (कंपनी के क्लर्क) ने की। एजीए ने अपील का विरोध करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही बताया था।

उच्च न्यायालय ने 13 दिसंबर 1985 का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर अपील स्वीकार कर ली। अपीलकर्ता जमानत पर थे, इसलिए उनके व्यक्तिगत और जमानती बंधपत्र निरस्त कर दिए गए। साथ ही उन्हें धारा 437ए सीआरपीसी के अनुपालन में जल्द से जल्द संबंधित ट्रायल कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया। आदेश की प्रति ट्रायल कोर्ट को भेजी जाएगी।