इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI एक्ट के दुरुपयोग पर ₹6.70 लाख का हर्जाना, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI एक्ट के दुरुपयोग पर ₹6.70 लाख का हर्जाना, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI एक्ट के दुरुपयोग पर ₹6.70 लाख का हर्जाना, याचिका खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को आर टी आई एक्ट के दुरुपयोग पर 6,70,000 रूपये हर्जाने के साथ याचिका खारिज कर दी है और यह राशि चार हफ्ते में विधिक सेवा समिति के खाते में जमा करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने दिया है।

याचिकाकर्ता विनय वेमुला ने उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आयुक्त द्वारा 28 जुलाई 2023 को पारित एक आदेश को चुनौती दी थी। उनकी अपील इस आधार पर खारिज हुई थी कि उन्हें मांगी गई जानकारी रजिस्टर्ड डाक से पहले ही 11 जनवरी 2023 को भेजी जा चुकी थी।

न्यायालय के रजिस्ट्रार आर टी आई की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 4 जून से 17 जुलाई 2026 के बीच सिर्फ इसी मामले से जुड़ी कोर्ट कार्यवाही के बारे में 24 आवेदन दाखिल किए। इनमें मांगी गई जानकारियों में शामिल थीं:- चीफ जस्टिस सचिवालय की आंतरिक फाइलों की प्रति, कोर्ट की इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड लॉग और सर्वर बैकअप रिकॉर्ड, कोर्ट की अटेंडेंस रजिस्टर और बेंच सेक्रेटरी लॉग, सिस्को वेबेक्स के सेशन कमांड लॉग, नेटवर्क सर्वर लॉग और लॉगिन-लॉगआउट टाइमलाइन, फाइल मूवमेंट रजिस्टर व ट्रांजिट लॉगबुक, रोस्टर व्यवस्था संबंधी नोटिफिकेशन, मामलों को "पास्ड ओवर" चिह्नित करने के कारण कोर्ट ने इन आवेदनों को "बेवजह और अस्पष्ट" करार देते हुए कहा कि इनसे न्यायिक कर्मचारियों का समय बर्बाद होता है और न्याय प्रशासन में बाधा पड़ती है।

24 जुलाई 2026 के पिछले आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से हाजिर हों। लेकिन 5 अगस्त को वे फिर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश हुए । जिसे कोर्ट ने अपने आदेश की अवहेलना माना। याचिकाकर्ता ने हैदराबाद से करीब 2000 किमी की दूरी और "लॉजिस्टिक समस्याओं" का हवाला देकर व्यक्तिगत उपस्थिति से इन्कार किया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश होना मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कोर्ट के विवेकाधिकार पर निर्भर एक सुविधा मात्र है।

एक अन्य विवादास्पद बिंदु यह रहा कि याचिकाकर्ता ने फार्मर रिटेन डिक्लेरेशन आप प्रोटेस्ट शीर्षक से एक ईमेल भी दाखिल किया, जो न तो शपथ आयुक्त और न ही नोटरी से सत्यापित था। कोर्ट ने इस शीर्षक को "अस्पष्ट और अवमाननापूर्ण" बताया।

याचिकाकर्ता ने विपक्षी संख्या 1, 3 और 4 पर जवाबी हलफनामा न दाखिल करने के लिए दंडात्मक कार्रवाई की मांग करते हुए एक आवेदन दाखिल किया था। कोर्ट ने पाया कि यह आवेदन तथ्यात्मक रूप से गलत था । प्रतिवादी संख्या 2 (राज्य सूचना आयोग आयुक्त) की ओर से जवाब पहले ही दाखिल हो चुका था और उसकी प्रति याचिकाकर्ता के वकील को दी जा चुकी थी। साथ ही, प्रतिवादी 1, 3 और 4 को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया ही नहीं गया था। इस आधार पर कोर्ट ने इस आवेदन को 50,000 के हर्जाने के साथ खारिज कर दिया।

न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता को जो सूचना चाहिए थी, वह पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी है, इसलिए मूल याचिका को खारिज कर दिया गया। साथ ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में मौजूद एक रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता एक शिकायतकर्ता महिला और उसकी बेटी को परेशान कर रहा था।

न्यायालय ने इस तरह के जुर्माने लगाए:

- ग़लत आवेदन पर:50,000 रूपये

- 24 आर टी आई आवेदनों पर, 5,000 रूपये प्रत्येक:कुल, 1,20,000रूपये,- न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए अतिरिक्त: 5,00,000 रूपये, - कुल:6,70,000रूपये (छह लाख सत्तर हज़ार रुपये),

न्यायालय ने आदेश दिया कि यह पूरी राशि चार हफ्तों के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के बैंक खाते में जमा की जाए, अन्यथा रजिस्ट्रार जनरल वसूली की उचित कार्रवाई करेंगे।