कार्यस्थल पर कर्मचारियों को सांता क्लॉस की टोपी पहनने के लिए मजबूर करना उचित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए हाईकोर्ट की टिप्पणी, वी बाजार के अधिकारियों को ऐसे निर्देश दोहराने से चेताया; आवेदक से संबंधित समन आदेश रद्द।
प्रयागराज,21 सितम्बर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी कार्रवाई की अनुमति नहीं है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी कर्मचारियों को कार्यस्थल पर सांता क्लॉस की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करने के खिलाफ चेतावनी देते हुए दी है। कोर्ट ने यह आदेश यह देखते हुए कहा कि इस तरह की बाध्यता विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि,"इस प्रकार की कार्रवाई देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है,जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता है।"
न्यायालय ने यह टिप्पणी विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह द्वारा दायर एक आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की,जिसमें उन्होंने आगरा के सदर बाजार पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से संबंधित आरोपपत्र,संज्ञान/समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। आवेदक के खिलाफ आईपीसी की धारा 298 (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द आदि कहना) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है।
आरोपों के अनुसार, आगरा के वी बाजार में कार्यरत आवेदक ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को "सांता क्लॉस की लाल टोपी" पहनने के लिए मजबूर किया। अभियोग पत्र और समन आदेश सहित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए, आवेदक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। न्यायालय ने आवेदन के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच करते हुए पाया कि वे "स्पष्ट रूप से" दर्शाते हैं कि इस तरह की बाध्यता वी बाजार के उच्च अधिकारियों द्वारा उत्पन्न की गई थी।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि सांता क्लॉस की लाल टोपी पहनने की अनिवार्यता किसी न किसी रूप में विभिन्न धर्मों और मान्यताओं की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही थी। इसमें आगे कहा गया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की कार्रवाई की अनुमति नहीं है, "जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता है"। परिणामस्वरूप, न्यायालय ने आवेदक और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को इस प्रकार के निर्देश न दोहराने की चेतावनी दी। न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसे निर्देश कर्मचारियों के बीच कार्यस्थल के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ सकते हैं।
आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने के संबंध में, आवेदक के वकील ने प्रस्तुत किया कि आईपीसी की धारा 298 और 504 गैर-संज्ञेय अपराध हैं। यह तर्क दिया गया कि सीआरपीसी की धारा 2(डी) की व्याख्या के मद्देनजर, गैर-संज्ञेय अपराध की जांच के बाद दर्ज की गई पुलिस रिपोर्ट को शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए और इसे पुलिस मामले के रूप में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। हालांकि राज्य ने आवेदन का विरोध किया, लेकिन सरकारी वकील ने इस कानूनी दलील पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
सीआरपीसी की धारा 2(डी) की व्याख्या का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में संबंधित जांच अधिकारी द्वारा धारा 298 और 504 आईपीसी के तहत प्रस्तुत आरोप पत्र को शिकायत माना जाएगा और उसी के अनुसार निर्णय लिया जाएगा।
न्यायालय ने माना कि मजिस्ट्रेट ने मामले को राज्य का मामला मानकर संज्ञान लेने में कानूनी त्रुटि की है। तदनुसार, हाईकोर्ट ने आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दिसंबर 2023 में पारित किए गए समन आदेश को आवेदक से संबंधित हिस्से के संदर्भ में रद्द कर दिया और आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश सक्षम न्यायालय को कानून के अनुसार, यदि आवश्यक हो, तो मामले को शिकायत मामले के रूप में मानकर आगे बढ़ने से नहीं रोकेगा।