पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल पटेल की सड़क दुर्घटना में मौत मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाने से किया इन्कार
पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदलाल पटेल की सड़क दुर्घटना में मौत मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाने से किया इन्कार
प्रयागराज, 17 सितंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सड़क दुर्घटना मुआवजा मामले में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के फैसले को बरकरार रखते हुए मुआवजा बढ़ाने की अपील खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने यह आदेश स्मृति कमला देवी एवं अन्य बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले में दिया।
15 मई 1999 को रात करीब 2 बजे इलाहाबाद-रायबरेली मार्ग पर ग्राम मलकिया के पास, थाना नवाबगंज क्षेत्र में एक ट्रक ने लापरवाही से चलाते हुए सामने से आ रही टाटा सूमो को टक्कर मार दी। इस हादसे में टाटा सूमो में सवार नंदलाल सिंह पटेल की मौके पर ही मौत हो गई। मृतक पेशे से अधिवक्ता थे, एक राजनीतिक दल के सदस्य थे और उत्तर प्रदेश में पहले कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।
अधिकरण ने मृतक की वार्षिक आय आयकर रिटर्न (1999-2000) के आधार पर 90,000 रुपये आंकी थी। व्यक्तिगत खर्च के रूप में एक-तिहाई राशि घटाने और 13 का गुणक लागू करने के बाद निर्भरता की हानि 78,000 रुपये निर्धारित की गई। इसके अलावा अंतिम संस्कार खर्च के लिए 2,000 रुपये और संपदा हानि के लिए 2,500 रुपये जोड़े गए। कुल मिलाकर 7,84,500 रुपये का अवार्ड पारित किया गया था।
मृतक के परिजनों की ओर से तर्क दिया गया कि उनकी वास्तविक वार्षिक आय 1,60,000 रुपये थी, जैसा कि आयकर रिटर्न में दर्शाया गया था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इसे नजरअंदाज कर दिया। साथ ही भविष्य की संभावनाओं को न जोड़ने, व्यक्तिगत खर्च में एक-तिहाई के बजाय एक-पंचमांश कटौती करने, तथा गैर-आर्थिक मदों में मुआवजा पैनी सेठी मामले के सिद्धांतों के अनुरूप बढ़ाने की मांग की गई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का पेशा, सामाजिक हैसियत या ओहदा,चाहे वह अधिवक्ता हो या पूर्व कैबिनेट मंत्री, अपने आप में उसकी आय तय करने का आधार नहीं बन सकता। आय का निर्धारण सबूतों के आधार पर होना चाहिए, न कि अनुमान या प्रतिष्ठा के आधार पर। कोर्ट ने कहा कि "न्यायोचित मुआवजा" निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए, न कि अप्रत्याशित लाभ का साधन।
अदालत ने यह भी कहा कि पैनी सेठी मामले में तय भविष्य की संभावनाओं का सिद्धांत "स्थापित आय" पर ही लागू होता है, और जब दावा की गई अधिक आय (1,60,000 रुपये) सबूतों से साबित ही नहीं हुई, तो उस पर भविष्य की संभावनाएं जोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित 90,000 रुपये की आय वास्तव में सबूतों की तुलना में पहले से ही अधिक प्रतीत होती है।
1999 की दुर्घटना होने के कारण अदालत ने व्यक्तिगत खर्च की कटौती में बदलाव से भी इनकार किया, यह कहते हुए कि सरला वर्मा में बाद में तय सिद्धांत पुराने मामलों पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किए जा सकते।
उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि समग्र रूप से देखने पर ट्रिब्यूनल द्वारा तय मुआवजा अपर्याप्त नहीं कहा जा सकता, इसलिए अपील खारिज कर दी गई और मुआवजे में किसी भी प्रकार की बढ़ोतरी से इन्कार कर दिया गया।