एफआईआर दर्ज कराने पुलिस अधिकारियों के बजाय सीधे हाईकोर्ट आने की प्रवृत्ति चिंताजनक -उच्च न्यायालय

एफआईआर दर्ज कराने पुलिस अधिकारियों के बजाय सीधे हाईकोर्ट आने की प्रवृत्ति चिंताजनक -उच्च न्यायालय

एफआईआर दर्ज कराने पुलिस अधिकारियों के बजाय सीधे हाईकोर्ट आने की प्रवृत्ति चिंताजनक -उच्च न्यायालय

प्रयागराज, 19 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चन्द्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना ने पत्रकार अमित कुमार श्रीवास्तव की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने प्रयागराज के थाना झूंसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 1 अगस्त 2025 को शाम करीब 7 बजे वे झूंसी क्षेत्र में बाढ़ की कवरेज कर घर लौट रहे थे, तभी रहीमापुर के पास दो मोटरसाइकिलों पर सवार चार अज्ञात लोगों ने उनकी कार पर फायरिंग कर दी। पत्रकार का दावा था कि गोलियां उनकी कार को लगीं और वे बाल-बाल बचे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह हमला अतीक अहमद गिरोह से जुड़े कथित भूमाफियाओं ने करवाया, क्योंकि उन्होंने चैनल पर इनके खिलाफ रिपोर्टिंग की थी। शिकायत में उन्होंने प्रतिवादी संख्या 4 से 11 तक के लोगों को नामजद किया, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि थानाध्यक्ष जानबूझकर आरोपिताें से मिले हुए हैं और ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफ आई आर दर्ज करना अनिवार्य है। अपर शासकीय अधिवक्ता ने याचिका को झूठी और मनगढ़ंत बताते हुए कड़ा विरोध किया। बताया गया कि: एस एच ओ झूंसी ने मौके की जांच की तो घटना स्थल पर ऐसी कोई वारदात होने के सबूत नहीं मिले। स्थानीय लोगों के बयान में भी फायरिंग की पुष्टि नहीं हुई। सीसीटीवी फुटेज जांच में पेट्रोल पंप पर याचिकाकर्ता और साथी सामान्य रूप से रुके, कोई हड़बड़ी नहीं दिखी। गाड़ी में मिले गोलों के निशान संदिग्ध पाए गए। एक डिग्गी में रजाई में फंसा मिला, दूसरा पिछली सीट में, जिससे फायरिंग की पुष्टि नहीं होती। सहायक पुलिस आयुक्त की स्वतंत्र जांच में भी आरोप झूठे पाए गए। जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पहले भी सुरक्षा (गनर) पाने की मांग करते रहे हैं और यह शिकायत सुरक्षा हासिल करने के मकसद से दर्ज कराई गई प्रतीत होती है।

न्यायालय ने कहा कि जहां तथ्यों को लेकर विवाद हो, वहां अनुच्छेद 226 के तहत एफआईआर दर्ज कराने का सीधा आदेश देना उचित नहीं है। कोर्ट ने साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008) और हाल के फैसले सुजल विश्वास अटावर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) का हवाला देते हुए कहा कि पीड़ित व्यक्ति को पहले बी एन एस एस की धारा 173(4) के तहत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए, और उसके बाद धारा 175(3) बी एन एस एस के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना चाहिए। न्यायालय ने इसे "वैकल्पिक" नहीं बल्कि "प्राथमिक और वरीयता प्राप्त" उपाय बताया। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि हाईकोर्ट में सीधे एफआईआर दर्ज कराने की मांग लेकर पहुंचने वाले वादियों की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि यह विधायी मंशा और मजिस्ट्रेट की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करता है।