हाईकोर्ट जज से जमानत अर्जी पर सम्पर्क करने की कोशिश, जज ने सुनवाई से अपने काे किया अलग

कोर्ट ने अपने पास से केस हटाकर चीफ जस्टिस को भेजा, कहा- यह इतिहास का काला दिन अदालत ने कहा, यह न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है अगर इसे नजरअंदाज किया गया तो न्यायपालिका में जनता का भरोसा कमजोर होगा

प्रयागराज, 30 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जमानत अर्जी पर आदेश जारी करने से पहले स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया और अन्य पीठ नामित करने के लिए लगभग 80 अर्जियां मुख्य न्यायाधीश को भेज दी। पक्षकार ने जज से संपर्क करने की कोशिश की थी, जिसे कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए कहा कि इतिहास का यह काला दिन है। कोर्ट ने कहा न्याय होना ही नहीं होते हुए दिखना भी चाहिए।

न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की अदालत में भोला प्रसाद की जमानत अर्जी की सुनवाई चल रही थी। अदालत ने सभी मामलों की सुनवाई पूरी कर ली थी और आदेश बाद में सुनाया जाना था।

सुनवाई के बाद पक्षकारों की ओर से कथित तौर पर पीठासीन जज तक सीधे पहुंच बनाने और संपर्क साधने की कोशिश की गई। अदालत ने इसे बेहद गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है और अगर इसे नजरअंदाज किया गया तो न्यायपालिका में जनता का भरोसा कमजोर होगा।

अपने आदेश में न्यायमूर्ति पहल ने कहा कि यह घटना अदालत के इतिहास में एक "काला दिन" है। उन्होंने कहा कि न्याय होना ही काफी नहीं, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी जरूरी है। अगर फैसला उसी पक्ष के हक में आता जिसका पक्ष सुनवाई में मजबूत लग रहा था, तो इससे यह गलत धारणा बन सकती थी कि फैसला बाहरी दबाव में दिया गया।

इन हालात को देखते हुए अदालत ने खुद को मामले से अलग करने का फैसला लिया और सभी संबंधित लगभग 80 जमानत मामलों को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया, ताकि उन्हें किसी उपयुक्त पीठ को सौंपा जा सके। सभी मामलों को अब 7 अगस्त 2026 को सुनवाई होगी।

कोर्ट ने वकीलों और वादकारियों को चेतावनी दी कि न्यायिक स्वतंत्रता कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि हर नागरिक को मिला संवैधानिक अधिकार है, और इसे कमजोर करने की किसी भी कोशिश की सख्त निंदा की जानी चाहिए।