वाराणसी में पितृपक्ष की तैयारियां शुरू, 26 सितंबर से पिशाचमोचन कुंड पर होंगे श्राद्ध-कर्म
वाराणसी में पितृपक्ष की तैयारियां शुरू, 26 सितंबर से पिशाचमोचन कुंड पर होंगे श्राद्ध-कर्म
वाराणसी, 20 सितंबर । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में पितृपक्ष को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड और गंगा तट पर बाढ़ का पानी उतरने के बाद कर्मकांडी ब्राह्मणों ने पिंडदान, तर्पण और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए व्यवस्थाएं शुरू कर दी हैं। वहीं, सनातनी परिवारों में भी अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए घरों की साफ-सफाई और श्राद्ध कर्म की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
सनातन परंपरा में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का विशेष काल माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का पृथ्वी लोक पर आगमन होता है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसी मान्यता के तहत लोग घरों और पवित्र तीर्थस्थलों पर श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान करते हैं।
पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से मानी जाती है, जबकि इसकी शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध से होती है। इस वर्ष पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर शनिवार को होगा। इसके बाद प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर रविवार, द्वितीया 28 सितंबर सोमवार और तृतीया 29 सितंबर, मंगलवार को होगा चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध 30 सितंबर बुधवार को, षष्ठी 01 अक्टूबर गुरुवार को, सप्तमी 02 अक्टूबर शुक्रवार को और अष्टमी 03 अक्टूबर शनिवार को होगा।
इसी तरह नवमी का श्राद्ध 04 अक्टूबर रविवार, दशमी 05 अक्टूबर सोमवार और एकादशी 06 अक्टूबर मंगलवार को होगा। द्वादशी 07 अक्टूबर बुधवार, त्रयोदशी 08 अक्टूबर गुरुवार और चतुर्दशी 09 अक्टूबर शुक्रवार को होगी। पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ 10 अक्टूबर शनिवार को होगा।
वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड स्थित शेरवाली कोठी के कर्मकांडी पंडित प्रदीप पांडेय ने बताया कि पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म सामान्यतः दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है। श्राद्ध कर्म में पिता, पितामह और प्रपितामह तथा माता, मातामह और प्रमातामह सहित तीन-तीन पीढ़ियों के पितरों का तर्पण किया जाता है।
उन्होंने बताया कि तर्पण के दौरान हाथों में जल, काला तिल और कुश लेकर अंगूठे और तर्जनी के मध्य से जल अर्पित करते हुए ‘ॐ पितृभ्यः स्वधायैभ्यः स्वधा नमः’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण से पितरों की तृप्ति और आत्मशांति होती है। पितृदोष से जुड़े धार्मिक विश्वासों में भी पितृपक्ष के दौरान किए जाने वाले श्राद्ध और तर्पण को महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन लोगों को अपने पितरों की पुण्यतिथि ज्ञात नहीं होती, वे परंपरा के अनुसार पूरे पितृपक्ष में तर्पण कर सकते हैं और सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों का विसर्जन करते हैं।
काशी के पिशाचमोचन कुंड और गंगा तट पर इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। इसे देखते हुए कर्मकांडी ब्राह्मणों ने अनुष्ठानों के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं।---------------