प्रेमचन्द की रचनाएं आज भी देती हैं समाज को नई सोच : नेहा गुप्ता

प्रेमचन्द की रचनाएं आज भी देती हैं समाज को नई सोच : नेहा गुप्ता

प्रेमचन्द की रचनाएं आज भी देती हैं समाज को नई सोच : नेहा गुप्ता

प्रयागराज, 31 जुलाई । कथासम्राट मुंशी प्रेमचन्द की रचनाएं आज भी समाज को नई सोच और सही दिशा देती हैं। प्रेमचन्द ने अपनी यथार्थवादी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया और मानवीय मूल्यों को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। प्रेमचन्द ने अपनी यथार्थवादी लेखनी से सामाजिक आडंबरों और कुरीतियों पर प्रभावी प्रहार किया। उनकी रचनाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि समाज को सही दिशा देने और जीवन को समझने की प्रेरणा भी देती हैं।

उक्त विचार शुक्रवार को कथासम्राट मुंशी प्रेमचन्द की जयंती के अवसर पर 'सर्जनपीठ', प्रयागराज के तत्वावधान में 'प्रेमचन्द कथा-लेखन की प्रासंगिकता'विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य वक्ता आकाशवाणी प्रयागराज की कार्यक्रम प्रमुख एवं सहायक निदेशक (कार्यक्रम) नेहा गुप्ता ने कहा।

उन्होंने कहा कि 'गोदान', 'गबन', 'कफन' और 'सेवासदन' जैसी रचनाएं प्रेमचन्द की गहरी सामाजिक समझ और विश्लेषण क्षमता का परिचय देती हैं। उनकी कहानियों की भाषा सरल होने के साथ-साथ पाठकों के मन को सीधे प्रभावित करती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा देती है।

प्रेमचन्द का साहित्य समाज का सजीव दर्पण

इस अवसर पर कार्यक्रम के आयोजक एवं भाषाविद् आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा कि प्रेमचन्द का साहित्य समाज का सजीव दर्पण है। उन्होंने सामाजिक विषमताओं और अन्याय का यथार्थ चित्रण करते हुए साहित्य को जनचेतना का प्रभावी माध्यम बनाया। यही कारण है कि प्रेमचन्द का कथा-साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। परिसंवाद में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने प्रेमचन्द के साहित्य में निहित सामाजिक चेतना, मानवता, समानता और नैतिक मूल्यों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में उनके साहित्य को आज के समय में भी समाज के लिए प्रेरणादायी और मार्गदर्शक बताया गया।

कथासम्राट मुंशी प्रेमचन्द की जयंती के अवसर पर 'सर्जनपीठ',प्रयागराज के तत्वावधान में 'प्रेमचन्द कथा-लेखन की प्रासंगिकता' विषय पर प्रयागराज और बलिया से संयुक्त रूप से राष्ट्रीय ऑनलाइन बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया। इसमें देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों, शिक्षाविदों और विद्वानों ने अपने विचार रखे।----