कानों में जरई, हाथों में नेग और बुजुर्गों का आशीर्वाद… कजरी तीज पर फिर जीवंत हुई गांवाें की लोक परंपरा
कानों में जरई, हाथों में नेग और बुजुर्गों का आशीर्वाद… कजरी तीज पर फिर जीवंत हुई गांवाें की लोक परंपरा
मीरजापुर, 31 अगस्त । उत्तर प्रदेश के जनपद मीरजापुर में आधुनिकता और बदलते फैशन के बीच गांवों में सोमवार को कजरी तीज की सदियों पुरानी ‘जरई’ परंपरा ने लोक संस्कृति की खूबसूरत झलक दिखा दी। बालिकाएं जौ के छोटे-छोटे पौधे लेकर घर-घर पहुंचीं और परिचितों व बुजुर्गों के कान में जरई खोंसकर उनसे आशीर्वाद लिया। बदले में बुजुर्गों ने बालिकाओं को नेग के रूप में रुपये दिए और सुख-समृद्धि की कामना की।
ग्रामीण अंचलों में कजरी तीज के दिन सुबह से ही बालिकाओं में जरई लगाने को लेकर उत्साह नजर आया। हाथों में जौ के पौधे लेकर वे परिचितों के घर पहुंचीं। बुजुर्गों के कान में जरई लगाते ही माहौल में अपनापन और उल्लास घुल गया। नेग पाकर बालिकाओं के चेहरे भी खिल उठे। कोटार निवासी दुष्यंत सिंह व बुजुर्ग गुलाब सिंह के अनुसार पहले कजरी तीज पर जरई की परंपरा गांवों में बेहद लोकप्रिय थी। बालिकाएं घर-घर जाकर जरई लगाती थीं और बुजुर्ग उन्हें स्नेहपूर्वक नेग देते थे। यह महज एक रस्म नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति, रिश्तों और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी थी।
हालांकि समय के साथ बदलती जीवनशैली और आधुनिक फैशन के कारण यह परंपरा अब सिमटती जा रही है। कई गांवों में इसकी जगह आधुनिक तौर-तरीकों ने ले ली है। बुजुर्गों का कहना है कि ऐसी लोकपरंपराएं हमारी पहचान हैं और इन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। सोमवार को कुछ गांवों में जरई की रस्म ने साबित किया कि बदलते दौर में भी मिट्टी से जुड़ी परंपराओं की खुशबू अभी बाकी है।