हाईकाेर्ट : फर्जी वकालतनामा के आरोप में दोनों पक्षों पर 50-50 हजार का हर्जाना

हाईकाेर्ट : फर्जी वकालतनामा के आरोप में दोनों पक्षों पर 50-50 हजार का हर्जाना

हाईकाेर्ट : फर्जी वकालतनामा के आरोप में दोनों पक्षों पर 50-50 हजार का हर्जाना

प्रयागराज, 26 अगस्त । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति के चुनाव विवाद से जुड़े एक पुनर्विलोकन आवेदन में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता और आवेदक, दोनों पक्षों पर 50-50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने यह आदेश शिव शंकर सिंह (यादव) द्वारा दाखिल पुनर्विलोकन अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया।

न्यायालय ने 5 मई 2026 को याचिका का निस्तारण करते हुए शिक्षा निदेशक को दो महीने के भीतर संस्था के चुनाव कराने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रतिवादी शिव शंकर सिंह ने पुनर्विलोकन आवेदन दाखिल कर दावा किया कि उन्होंने कभी किसी अधिवक्ता को वकालतनामा नहीं दिया और न ही कैविएट आवेदन दाखिल करने की सहमति दी थी।

न्यायालय ने विवाद को सुलझाने के लिए फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल), प्रयागराज से हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट मंगाई। जांच में सामने आया कि शिव शंकर सिंह के जिन हस्ताक्षरों को वे "स्वीकृत" बता रहे थे, वे भी उनके नमूना हस्ताक्षरों और बैंक खाते के हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते। इस आधार पर कोर्ट ने पाया कि आवेदक अपने हस्ताक्षर जाली होने के दावे को साबित नहीं कर सका।

न्यायालय ने अधिवक्ता आर.सी. द्विवेदी के आचरण को प्रक्रियागत लापरवाही माना, न कि जानबूझकर कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास, क्योंकि उन्होंने बिना शर्त माफी मांगते हुए अपनी गलती स्वीकार की थी। वहीं दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता एस.सी. द्विवेदी को कोर्ट ने तथ्यों को जानबूझकर छिपाने का दोषी पाया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2009 के चुनाव को "निर्विवाद" बताया गया, जबकि रिकॉर्ड पर मौजूद संयुक्त शिक्षा निदेशक के 16 अप्रैल 2016 के आदेश और तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षिका मालती राय के पत्र से स्पष्ट था कि 2009 के चुनाव विवादित थे।

न्यायालय ने वकालतनामा को अधिवक्ता-मुवक्किल संबंध की कानूनी बुनियाद बताते हुए कहा कि बिना जानकारी या सहमति के दाखिल वकालतनामा कोर्ट के साथ गलतबयानी के समान है। कोर्ट ने भगवान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, नारायण पांडेय बनाम पन्नालाल पांडेय सहित कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी वकालतनामा दाखिल करना गंभीर व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आता है।

न्यायालय ने पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के अध्याय-22, नियम-5 के तहत कैविएट दाखिल करने के लिए शपथ-पत्र संलग्न करने की कोई अनिवार्यता नहीं है, जिसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए कोर्ट ने आदेश की प्रति मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक पटल पर भेजने का निर्देश दिया, ताकि कैविएट आवेदन के साथ शपथ-पत्र अनिवार्य करने पर विचार किया जा सके।

न्यायालय ने 5 मई 2026 के आदेश को पुनर्विलोकन में लेते हुए वापस लिया और मामले को संबंधित कोर्ट के समक्ष पुनः सुनवाई के लिए भेज दिया। साथ ही, प्रक्रिया के दुरुपयोग के लिए याचिकाकर्ता अवधेश राय और आवेदक शिव शंकर सिंह (यादव), दोनों पर 50-50 हजार रुपये की लागत हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति के खाते में एक माह के भीतर जमा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय में लागत जमा नहीं की जाती, तो रजिस्ट्रार जनरल दोनों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करेंगे।