बीएचयू के अध्ययन में खुलासा: स्वस्थ भोजन की जानकारी के बावजूद युवा नहीं अपना पा रहे स्वस्थ विकल्प

—आठ महानगरों के 68 युवाओं पर अध्ययन में सामने आईं बाधाएं—महंगाई, समय की कमी, खाना पकाने का कौशल, सामाजिक दबाव और डिजिटल मार्केटिंग प्रमुख कारण

बीएचयू के अध्ययन में खुलासा: स्वस्थ भोजन की जानकारी के बावजूद युवा नहीं अपना पा रहे स्वस्थ विकल्प

वाराणसी,29 अगस्त । भारतीय युवा स्वस्थ और अस्वस्थ भोजन के बीच अंतर को अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन स्वस्थ भोजन को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने में उन्हें कई तरह की व्यावहारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के नेतृत्व में आठ महानगरों में किए गए एक गुणात्मक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन के अनुसार भोजन की कीमत, सुविधा, व्यस्त जीवनशैली, खाना पकाने के सीमित कौशल, सामाजिक प्रभाव और डिजिटल मार्केटिंग युवाओं के स्वस्थ भोजन विकल्पों में बड़ी बाधाएं बन रही हैं।

बीएचयू के जनसम्पर्क कार्यालय के अनुसार, मुंबई, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, चेन्नई, दिल्ली और बेंगलुरु के 68 युवा वयस्कों को अध्ययन में शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने युवाओं की भोजन संबंधी धारणाओं और स्वस्थ भोजन अपनाने में आने वाली व्यावहारिक बाधाओं को समझने का प्रयास किया। यह अध्ययन बीएमसी पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। इसमें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के साथ डीकिन यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया और अहमदाबाद यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता शामिल रहे।

—स्वस्थ भोजन की समझ, लेकिन व्यवहार में अंतर

अध्ययन में शामिल प्रतिभागी सामान्य तौर पर फल, सब्जियां, दालें, अनाज और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को स्वस्थ मानते थे, जबकि गहरे तेल में तले और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को अस्वस्थ मानते थे। हालांकि, स्वस्थ भोजन की इस समझ और वास्तविक भोजन व्यवहार के बीच स्पष्ट अंतर देखने को मिला। अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि किसी भी प्रतिभागी ने भोजन को स्वस्थ या अस्वस्थ तय करने के लिए पोषण संबंधी लेबल या स्वास्थ्य संबंधी दावों पर निर्भर रहने की बात नहीं कही। इससे संकेत मिलता है कि केवल पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना युवाओं के भोजन व्यवहार में बदलाव के लिए पर्याप्त नहीं है।

—महंगा स्वस्थ भोजन, सस्ता जंक फूड बड़ी चुनौती

भोजन की कीमत स्वस्थ विकल्प चुनने में प्रमुख बाधाओं में से एक रही। प्रतिभागियों ने फल, सब्जियों और ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों सहित पौष्टिक खाद्य पदार्थों को अक्सर महंगा बताया, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और जंक फूड को अपेक्षाकृत सस्ता तथा आसानी से उपलब्ध विकल्प माना। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है। यदि पौष्टिक और स्वस्थ भोजन आर्थिक रूप से सुलभ नहीं होगा, तो केवल लोगों को पोषण के प्रति जागरूक करना पर्याप्त नहीं होगा। स्वस्थ विकल्पों को किफायती और आसानी से उपलब्ध बनाना भी जरूरी है।

—समय की कमी और खाना पकाने के कौशल का अभाव

अध्ययन में व्यस्त जीवनशैली को भी स्वस्थ भोजन अपनाने में बड़ी बाधा पाया गया। शैक्षणिक और कार्य संबंधी व्यस्तताओं के कारण कई युवा भोजन तैयार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। खाना पकाने के सीमित कौशल और भोजन बनाने में लगने वाली मेहनत भी उन्हें रेडी-टू-ईट भोजन, पहले से तैयार खाद्य पदार्थों और ऑनलाइन फूड डिलीवरी की ओर आकर्षित करती है।

प्रतिभागियों ने घर के बने भोजन को अपेक्षाकृत स्वस्थ माना, लेकिन व्यस्त दिनचर्या के कारण नियमित रूप से घर पर खाना बनाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। अध्ययन इस ओर भी संकेत करता है कि खाना पकाने और भोजन तैयार करने की क्षमता को केवल घरेलू कामकाज का कौशल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले महत्वपूर्ण जीवन कौशल के रूप में देखा जाना चाहिए।

—दोस्तों और सामाजिक माहौल का भी असर

अध्ययन में यह भी सामने आया कि युवाओं के भोजन विकल्प केवल उनकी व्यक्तिगत पसंद से तय नहीं होते। दोस्तों और सामाजिक माहौल का उनके खान-पान पर खासा प्रभाव पड़ता है। प्रतिभागियों ने बताया कि दोस्तों के साथ भोजन करते समय वे कई बार ऐसे खाद्य पदार्थ भी खा लेते हैं, जिन्हें वे सामान्य परिस्थितियों में पसंद नहीं करते या स्वस्थ नहीं मानते। शोधकर्ताओं के अनुसार, युवाओं के भोजन व्यवहार को समझने के लिए व्यक्तिगत जागरूकता के साथ-साथ आर्थिक स्थिति, भोजन की उपलब्धता, समय, सामाजिक वातावरण और बदलती डिजिटल संस्कृति जैसे व्यापक कारकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।