साढ़े चार सदियों से जीवंत है ऐशबाग की रामलीला, तुलसीदास ने की थी शुरुआत

साढ़े चार सदियों से जीवंत है ऐशबाग की रामलीला, तुलसीदास ने की थी शुरुआत

साढ़े चार सदियों से जीवंत है ऐशबाग की रामलीला, तुलसीदास ने की थी शुरुआत

लखनऊ, 12 अक्टूबर  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला मैदान में करीब साढ़े चार सौ वर्षों से चली आ रही रामलीला की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है। गोस्वामी तुलसीदास की प्रेरणा से शुरू हुई इस रामलीला को अवध के तत्कालीन नवाब आसफुद्दौला का संरक्षण और आर्थिक सहयोग मिला था। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल मानी जाने वाली इस रामलीला का स्वरूप समय के साथ बदला है, लेकिन श्रीरामचरितमानस के प्रसंगों और पात्रों का मूल भाव आज भी बरकरार है। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यहां पहुंचे थे और तीर चलाकर रावण वध किया था। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी भी कई बार रामलीला में शामिल होकर कलाकारों को आशीर्वाद दे चुके थे।

ऐशबाग की ऐतिहासिक रामलीला का मंचन रविवार से शुरू हो गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के निजी सलाहकार अवनीश अवस्थी ने रामोत्सव का दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ किया। रामलीला समिति के अध्यक्ष हरिश्चंद्र अग्रवाल सहित अन्य पदाधिकारियों ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया। इस बार भी रामलीला में पारंपरिक मंचन के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। मूविंग रावण, बड़ी एलईडी स्क्रीन, लेजर लाइट, होलोग्राम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक दर्शकों के आकर्षण का केंद्र हैं।

तुलसीदास की प्रेरणा से शुरू हुई रामलीला की परंपरा

ऐशबाग रामलीला के इतिहास के संबंध में प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में इसकी शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य रामचरितमानस में वर्णित भगवान श्रीराम की लीलाओं को अभिनय के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाना था, ताकि कम पढ़े-लिखे लोग भी रामकथा के प्रसंगों और उनके संदेशों को आसानी से समझ सकें।

बताया जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने चौमासा यानी वर्षा ऋतु के चार महीनों के दौरान ऐशबाग में प्रवास किया था। इस दौरान अयोध्या से आने वाले साधु-संत भी यहां ठहरते थे। तुलसीदास ने साधु-संतों के सहयोग से रामकथा का मंचन कर उसके संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इसी परंपरा ने आगे चलकर ऐशबाग रामलीला का रूप लिया।

रामलीला को विस्तार देने में अवध के तत्कालीन नवाब आसफुद्दौला का महत्वपूर्ण योगदान बताया जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार, उन्होंने रामलीला और ईदगाह के लिए बराबर-बराबर साढ़े छह-साढ़े छह एकड़ जमीन उपलब्ध कराई थी। साथ ही, रामलीला के आयोजन के लिए आर्थिक सहायता भी दी। बाद के दौर में अवध के तीसरे बादशाह मौलाना मुहम्मद अली शाह की ओर से भी शाही खजाने से सहायता दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह ऐशबाग की रामलीला धार्मिक सद्भाव और साझा सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक बन गई।

1857 की क्रांति के दौरान तीन साल बंद रहा आयोजन

ऐशबाग रामलीला के इतिहास में कई उतार-चढ़ाव आए। वर्ष 1857 की क्रांति और उसके बाद के दौर में 1857 से 1859 तक रामलीला का आयोजन बंद रहा। इसके बाद वर्ष 1860 में ऐशबाग रामलीला समिति का गठन किया गया। समिति के गठन के बाद आयोजन को व्यवस्थित रूप मिला और रामलीला की परंपरा फिर आगे बढ़ने लगी। समय के साथ आयोजन की भव्यता बढ़ती गई। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण यह रामलीला लखनऊ की पहचान का अहम हिस्सा बन गई। आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक रामलीला देखने पहुंचते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीर चलाकर किया था रावण वध

ऐशबाग रामलीला की विशिष्टता में देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति भी शामिल है। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी कई बार यहां आए थे। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विशेष अतिथि के रूप में रामलीला में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने तीर चलाकर रावण वध किया और इस ऐतिहासिक परंपरा की सराहना की।

रामलीला समिति के अध्यक्ष हरिश्चंद्र अग्रवाल ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास की प्रेरणा से चित्रकूट, काशी और लखनऊ में रामलीला की परंपरा का विस्तार हुआ। उन्होंने कहा कि चौमासा के दौरान अयोध्या से आने वाले साधु-संत ऐशबाग में ठहरते थे और दशहरे के समय रामकथा का मंचन करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि रामलीला को समय-समय पर प्रमुख हस्तियों का सहयोग मिलता रहा है।

आधुनिक तकनीक से जुड़ रही परंपरा

करीब 450 वर्ष पुरानी इस रामलीला को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए आयोजक आधुनिक तकनीक का सहारा ले रहे हैं। मंचन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, होलोग्राम, एलईडी प्रोजेक्शन और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। मैदान में विशाल एलईडी स्क्रीन, लेजर लाइट और करीब 70 फीट ऊंचा मूविंग रावण दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं।

आयोजकों के अनुसार, वर्ष 2007 से रामलीला का सीधा प्रसारण डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब तथा फेसबुक पर किया जा रहा है। इससे देश-विदेश में रहने वाले श्रद्धालु भी घर बैठे इस आयोजन को देख सकते हैं। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के बावजूद रामचरितमानस के पात्रों, प्रसंगों और संवादों के मूल भाव को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया जाता है।

विजयादशमी पर 70 फीट के रावण का होगा दहन

रामलीला का समापन विजयादशमी के अवसर पर होगा। इस दिन मैदान में करीब 70 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। रावण दहन के साथ भव्य आतिशबाजी भी आकर्षण का केंद्र रहती है। आयोजन को देखने के लिए लखनऊ के अलावा आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। आयोजकों के अनुसार, इस अवसर पर एक लाख से अधिक लोगों के जुटने की संभावना रहती है।

तुलसीदास की विरासत को संरक्षित करने की पहल

गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से वर्ष 2003 में तुलसी शोध संस्थान की शुरुआत की गई। ऐशबाग रामलीला मैदान से तुलसीदास की स्मृतियां भी जुड़ी हुई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने यहां विनय पत्रिका के कुछ अंशों की रचना की थी। इन स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए संस्थान का भवन भी बनाया गया। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता रवि गुप्ता का कहना है कि ऐशबाग की रामलीला देखना केवल एक धार्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के चरित्र और उनके आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा लेना भी है।

पंडित बेनीमाधव केदारनाथ 'पाद्या' का रहा अहम योगदान

ऐशबाग रामलीला की परंपरा को जीवंत बनाए रखने में कई स्थानीय हस्तियों और परिवारों का योगदान रहा है। इनमें पंडित बेनीमाधव केदारनाथ 'पाद्या' का नाम भी महत्वपूर्ण है। लखनऊ के पूर्व महापौर डॉ. दिनेश शर्मा के परिवार की परंपरा से जुड़े पाद्या जी ने रामलीला को स्थानीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाने और इसकी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उनके योगदान को स्मरणीय बनाने के लिए रामलीला मैदान परिसर में एक भव्य प्रवेश द्वार का निर्माण कराया गया है, जिसका नाम 'पंडित बेनीमाधव केदारनाथ पाद्या जी द्वार' रखा गया है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा लंबे समय से श्री रामलीला समिति, ऐशबाग के मुख्य संरक्षक के रूप में जुड़े हुए हैं। लखनऊ के महापौर, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और सांसद के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पड़ावों पर उन्होंने इस ऐतिहासिक आयोजन को प्रोत्साहित किया है।

ऐशबाग की रामलीला आज भी इस बात की मिसाल है कि समय और तकनीक बदलने के बावजूद सांस्कृतिक परंपराएं अपनी मूल भावना के साथ जीवित रह सकती हैं। तुलसीदास की प्रेरणा, नवाबों के संरक्षण, स्थानीय समाज के योगदान और आधुनिक प्रस्तुति के मेल ने इस आयोजन को लखनऊ की ऐतिहासिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बना दिया है।