निर्माण पूरा होने से पहले फ्लैटों का कब्जा कैसे? GDA उपाध्यक्ष तलब, बिल्डर पर FIR के बावजूद कब्जा देने पर कोर्ट सख्त
गाजियाबाद में Completion Certificate से पहले फ्लैटों की बिक्री और कब्जे पर हाईकोर्ट ने जताई गंभीर चिंता, 10 सितंबर को GDA उपाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश
निर्माण पूरा हुए बिना फ्लैटों का कब्जा देने पर उच्च न्यायालय ने जताई चिंता
गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष तलब
प्रयागराज, 08 सितंबर (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद में पूर्णता प्रमाणपत्र जारी होने से पहले फ्लैटों की बिक्री और खरीदारों को कब्जा दिए जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को तलब कर यह बताने का निर्देश दिया है कि प्राधिकरण की ओर से आपत्तियां उठाए जाने और बिल्डर के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बावजूद फ्लैटों का कब्जा कैसे दे दिया जा रहा।
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने सुरेश चंदर व 10 अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
कोर्ट ने कहा कि पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करने वाली सक्षम प्राधिकारी का यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भवन स्वीकृत नक्शे और संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप पूरा हुआ है। प्रमाणपत्र का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भवन सभी तरह से पूरा और खरीदारों के रहने के लिए उपयुक्त है।
आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के सचिव की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (प्रमोशन ऑफ कंस्ट्रक्शन, ओनरशिप एंड मेंटेनेंस) एक्ट, 2010 की धारा 4(5) और उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15-ए के तहत जीडीए के उपाध्यक्ष सक्षम प्राधिकारी हैं। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से इस पर आपत्ति जताई गई, जिस पर कोर्ट ने 2010 के अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी कौन है, इस प्रश्न को फिलहाल खुला छोड़ दिया।
बिल्डर की ओर से कहा गया कि पूर्णता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया गया था और विकास प्राधिकरण की ओर से कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। इसलिए 1973 के अधिनियम की धारा 15-ए के प्रावधान के तहत प्रमाणपत्र को जारी हुआ माना जाना चाहिए। इसके विपरीत कोर्ट को बताया गया कि प्राधिकरण ने आवेदन पर आपत्तियां दर्ज की थीं और बिल्डर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई थी। इन विरोधाभासी दावों पर कोर्ट ने प्राधिकरण से स्पष्टीकरण मांगा है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि 15 नवंबर 2011, छह अप्रैल 2015 और 19 दिसंबर 2024 को स्वीकृत कंपाउंडेड भवन योजनाओं में परियोजना पूरी करने की कोई तारीख दर्ज नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में वैधानिक प्रावधानों का पालन क्यों नहीं किया गया, इसका भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
सुनवाई के दौरान एक और गंभीर विसंगति सामने आई। प्राधिकरण की कार्यालयी नोटिंग में उल्लेख था कि बिल्डर को 29 मई 2006 को स्वीकृत भवन मानचित्र को जीडीए उपाध्यक्ष के तीन जुलाई 2010 के आदेश से निरस्त कर दिया गया था। लेकिन मूल रिकॉर्ड पेश किए जाने पर ऐसा कोई आदेश नहीं मिला। कोर्ट को बताया गया कि नक्शे का निरस्तीकरण केवल कार्यालयी नोटिंग में दर्ज था। कोर्ट ने कहा कि इससे भवन नक्शों को निरस्त और स्वीकृत करने की प्रक्रिया पर गंभीर संदेह पैदा होता है।
खंडपीठ ने जीडीए उपाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि पूर्णता प्रमाणपत्र को लेकर कथित आपत्तियों के बावजूद खरीदारों को कब्जा कैसे दिया गया और 29 मई 2006 के स्वीकृत भवन नक्शे को किस परिस्थिति में निरस्त किया गया। साथ ही बिल्डर के अधिवक्ता को एफआईआर की तारीख और आपत्तियों की जानकारी होने के बावजूद फ्लैटों का कब्जा देने की परिस्थितियों के संबंध में निर्देश प्राप्त कर जवाब देने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी।