संज्ञेय अपराध की सूचना पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस का कर्तव्य : हाईकोर्ट
दलित छात्र नेता के साथ मार-पीट,जातिसूचक गाली के मामले में मुकदमा दर्ज करने से मना करने वाला आदेश रद्द
प्रयागराज, 30 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एससी एवं एसटी एक्ट के तहत विशेष अदालत, प्रयागराज के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक दलित छात्र नेता विवेक कुमार की शिकायत पर एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली अर्जी को "संदिग्ध" बताकर खारिज कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकल पीठ ने यह आदेश दिया है।
याची विवेक कुमार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर और यूजीसी-नेट उत्तीर्ण छात्र हैं। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की इलाहाबाद इकाई के अध्यक्ष भी रहे हैं। आरोप है कि 17 अक्टूबर 2023 को विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी गेट (गेट नंबर 1) के बाहर लाइब्रेरी को 24 घंटे खुला रखने, निलंबित छात्रों की बहाली और स्वच्छ शौचालय जैसी मांगों को लेकर छात्रों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा था। इसी दौरान विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर राकेश सिंह ने कथित तौर पर बिना किसी उकसावे के आक्रामक होकर विवेक कुमार के साथ जातिसूचक अपशब्दों का प्रयोग किया और लाठी से मारपीट कर उन्हें घायल कर दिया।
याचिका के मुताबिक यह घटना मौके पर मौजूद एक सब-इंस्पेक्टर के सामने हुई और सीसीटीवी व मोबाइल फुटेज में भी कैद हुई। पुलिस द्वारा मेडिकल जांच की सुविधा न दिए जाने पर विवेक कुमार को खुद तेज बहादुर सप्रू अस्पताल जाकर इलाज कराना पड़ा। अगले दिन यह घटना प्रमुख समाचार पत्रों में तस्वीरों सहित प्रकाशित हुई।
याची का कहना है कि घटना के दिन ही उन्होंने कोतवाली कर्नलगंज थाने में लिखित शिकायत दी, जो विजिटर्स बुक में दर्ज हुई। अगले दिन एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी के साथ एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराने के लिए दोबारा शिकायत दी गई, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। इसके बाद पुलिस आयुक्त, प्रयागराज सहित उच्च अधिकारियों को रजिस्टर्ड डाक से शिकायत भेजी गई, फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
पुलिस की निष्क्रियता से क्षुब्ध होकर विवेक कुमार ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, प्रयागराज की अदालत में आवेदन दिया, जिसे 18 फरवरी 2024 के आदेश से यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मामला "संदिग्ध" प्रतीत होता है।
उच्च ने निचली अदालत के आदेश को त्रुटिपूर्ण और गैर-तर्कसंगत करार दिया। न्यायालय ने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने मेडिकल रिपोर्ट और मीडिया में छपी तस्वीरों जैसे साक्ष्यों पर विचार किए बिना ही केवल "संदिग्ध" शब्द के सहारे आवेदन खारिज कर दिया, जो न्यायिक मस्तिष्क के प्रयोग के अभाव को दर्शाता है।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है और इस स्तर पर आरोपों की सत्यता की जांच करने की जरूरत नहीं होती।
न्यायालय ने निचली अदालत के 18 फरवरी 2024 के आदेश को रद्द कर दिया और मामला विशेष अदालत को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया। और निचली अदालत को साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन कर तीन माह में तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
साथ ही कहा है कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के तहत कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई पर भी विचार किया जाय।
अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पूरे मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए विशेष अदालत को लौटा दिया है।