प्रतिदिन 400-800 मामले सूचीबद्ध, फिर भी लोग न्यायाधीशों से रोबोट की तरह काम करने की अपेक्षा करते हैं : हाईकोर्ट
प्रतिदिन 400-800 मामले सूचीबद्ध, फिर भी लोग न्यायाधीशों से रोबोट की तरह काम करने की अपेक्षा करते हैं : हाईकोर्ट
प्रयागराज, 02 जून । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अवमानना के केस में टिप्पणी की कि भले ही एक न्यायाधीश के समक्ष एक दिन में 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं, फिर भी लोग न्यायाधीशों से सुपर रोबोट या सुपर कम्प्यूटर की तरह काम करने की अपेक्षा करते हैं।
न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में काफी समय लगता है, लेकिन इस दौरान पक्षों को न्यायालय के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने आगे कहा, ‘कानून इस तरह की धृष्टता को बर्दाश्त नहीं करता।’ पीठ ने कहा कि यदि ऐसी स्थिति की अनुमति दी गई तो न्याय प्रशासन अराजकता और अव्यवस्था में डूब जाएगा।
“इलाहाबाद उच्च न्यायालय जैसी अत्यधिक बोझिल संवैधानिक अदालतों में, जहाँ प्रत्येक न्यायाधीश के समक्ष प्रतिदिन लगभग 400, 500, 600 और कभी-कभी 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं, न्यायिक कार्यवाही के निपटारे में काफी समय लग सकता है। कभी-कभी वर्षों और कभी-कभी दशकों भी लग सकते हैं। फिर भी, लोग ऐसे अतिभारित न्यायाधीशों से निरंतर कार्य करने वाले सुपर रोबोट, सुपर कम्प्यूटर या अलौकिक प्राणी बनने की अपेक्षा करते हैं,” न्यायाधीश ने टिप्पणी की।
न्यायालय ने ये टिप्पणियां एक शिक्षक के वेतन से संबंधित आदेश के कार्यान्वयन न होने के आरोप वाली अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए की। गाजीपुर के जिला विद्यालय निरीक्षक 18 अप्रैल, 2022 को पारित अंतरिम आदेश को लागू करने में विफल रहे थे। राज्य सरकार ने इस विफलता को इस आधार पर उचित ठहराया कि अदालत के आदेश के खिलाफ स्थगन अर्जी (स्टे वैकेशन) दायर की गई थी।
न्यायालय ने राज्य के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई। न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक न्यायालय का आदेश न तो महज सलाह है और न ही दिखावटी कागज का टुकड़ा जिसे सुविधा के अनुसार सराहा या अनदेखा किया जा सके।
“इसमें संविधान का पूर्ण अधिकार और विधि के शासन का गंभीर दायित्व निहित है। जिस क्षण वादियों को न्यायिक निर्देशों को वैकल्पिक मानने की अनुमति दी जाती है, संवैधानिक शासन की नींव ही कमजोर होने लगती है,” न्यायालय ने कहा।
पीठ ने कहा कि इस प्रकार का आवेदन दाखिल करने से न्यायालय के मौजूदा आदेश पर कोई असर नहीं पड़ता, वह निलम्बित नहीं होता, निष्क्रिय नहीं होता या सुप्त नहीं हो जाता।
इसमें आगे कहा गया है, ‘यदि केवल आवेदन दाखिल करने को ही न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने का लाइसेंस मान लिया जाए, तो प्रत्येक अवमानना करने वाला व्यक्ति बार-बार आवेदन दाखिल करके और फिर उनकी लंबितता की आड़ में आसानी से अनुपालन से बच जाएगा।’ यदि केवल आवेदन दाखिल करने को ही न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने का लाइसेंस मान लिया जाए, तो प्रत्येक अवमाननाकर्ता आसानी से अनुपालन से बच जाएगा।
न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसा दृष्टिकोण न्यायपालिका के अधिकार पर सीधा हमला करने से कम नहीं है। कानून की गरिमा पर जोर देते हुए न्यायालय ने महात्मा गांधी की ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ का उल्लेख किया।
महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन, जैसा कि उनकी महत्वपूर्ण रचना ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में व्यक्त किया गया है कि ‘आपकी अनुमति के बिना कोई आपका अपमान नहीं कर सकता’, अवमानना के क्षेत्र में भी अत्यंत प्रासंगिक है।
कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक न्यायालय द्वारा पारित आदेश, जब तक वह प्रभावी और निरस्त नहीं किया जाता, बाध्यकारी बल और निर्विवाद पवित्रता रखता है। यदि ऐसे आदेश का खुलेआम उल्लंघन किया जाता है और न्यायालय केवल इसलिए अनुपालन लागू करने या अवमानना की कार्रवाई शुरू करने से परहेज करता है क्योंकि अंतरिम आदेश को वापस लेने, संशोधित करने या निरस्त करने के लिए आवेदन विचाराधीन है, तो न्यायिक अधिकार के परिणामस्वरूप होने वाले क्षरण का दोष केवल अवमानना करने वाले पर नहीं लगाया जा सकता है।
चार वर्षों तक आदेश का पालन न होने के कारण न्यायालय ने कहा कि गाजीपुर के जिला विद्यालय निरीक्षक न्यायालय की अवमानना के दोषी हैं। तदनुसार, न्यायालय ने उनके विरुद्ध न्यायालय की अवमानना के आरोप तय करने के लिए मामले की सुनवाई 8 जुलाई को सूचीबद्ध की है।
हालांकि, अदालत ने कहा कि यदि उसे ऐसा करने की सलाह दी जाती है, तो वह अभी भी 2022 के रिट कोर्ट के आदेश का पालन कर सकता है और अवमानना से मुक्त हो सकता है।