'राम अमीरों के, शिव गरीबों के...' आखिर चुनाव से पहले भगवान को बांटने वाली यह स्क्रिप्ट किसने लिखी?
वो एक बयान जिसने हिंदू आस्था को दो हिस्सों में बांटने की कोशिश की... आखिर इस तीर का असली निशाना कौन है?
प्रयागराज न्यूज़ डेस्क | सियासत का काम समाज की दूरियां मिटाना और नीतियां बनाना है, लेकिन अब राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए देवी-देवताओं को भी बांटने से पीछे नहीं हट रहे हैं। जिन भगवान राम ने वनवास के दौरान माता शबरी के जूठे बेर खाए और निषादराज को गले लगाया, आज उन्हें 'अमीरों का भगवान' बताया जा रहा है। वहीं, जिन भगवान शिव के दरबार में राजा और रंक का भेद मिट जाता है, उन्हें केवल 'गरीबों का भगवान' कहकर उत्तर-दक्षिण की राजनीति में घसीटा जा रहा है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के इस हालिया बयान ने देश भर में एक बड़ा सियासी और आध्यात्मिक विवाद खड़ा कर दिया है।
क्या है पूरा विवाद? दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस बात पर चर्चा हो रही थी कि कांग्रेस दक्षिण भारत में मजबूत और उत्तर भारत में कमजोर क्यों है। इस राजनीतिक सवाल का जवाब देते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने सीधे भगवान राम और शिव का जिक्र कर दिया।
रेड्डी ने कहा, "हम द्रविड़ हैं और हम शिव के भक्त हैं। बीजेपी वाले राम के भक्त हैं।" उन्होंने बीजेपी पर राम को 'चुराने' का आरोप लगाते हुए पूछा कि बीजेपी के मंचों से सिर्फ 'जय श्री राम' ही क्यों सुनाई देता है, 'हर हर महादेव' क्यों नहीं? इसके बाद उन्होंने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा कि "शिव गरीबों के भगवान हैं, राम अमीरों के भगवान हैं और बीजेपी अमीरों की पार्टी है।"
बीजेपी और हिंदू संगठनों का तीखा पलटवार इस बयान के बाद सियासी घमासान मचना तय था। केंद्रीय मंत्री और तेलंगाना से बीजेपी नेता बंडी संजय कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस बयान का कड़ा विरोध किया। उन्होंने राम और शिव को उत्तर और दक्षिण में बांटने की इस कोशिश को हिंदू आस्था का सीधा अपमान बताया।
वहीं, विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कांग्रेस पर हिंदू समाज को बांटने की साजिश का आरोप लगाया। बंसल ने कहा कि कांग्रेस अब जातियों और क्षेत्रों के बाद भगवानों के नाम पर भी समाज में दरार डालना चाहती है। वीएचपी ने कांग्रेस आलाकमान से इस विवादित बयान पर पूरे देश से माफी मांगने की मांग की है।
इतिहास और आध्यात्म की कसौटी पर बयान की सच्चाई राजनीति भले ही राम और शिव को अपने चश्मे से देखे, लेकिन भारतीय आध्यात्म में 'हरि' (राम) और 'हर' (शिव) एक ही हैं।
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क्या शिव केवल दक्षिण के हैं? रेवंत रेड्डी ने शिव को दक्षिण (द्रविड़) से जोड़ा, लेकिन शिव का मुख्य निवास 'कैलाश' सुदूर उत्तर में है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश) और केदारनाथ (उत्तराखंड) उत्तर भारत में ही स्थित हैं।
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क्या राम केवल उत्तर के हैं? भगवान राम का सबसे बड़ा पदचिह्न दक्षिण भारत में मिलता है। रामेश्वरम (तमिलनाडु) में भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले खुद अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की थी। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम के मुख से स्पष्ट कहलवाया है— "शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहुं नहिं भावा।"
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अमीर और गरीब का नैरेटिव: राम जब अयोध्या के राजा थे, तब वो संपन्न थे, लेकिन वनवास के दौरान उन्होंने राजसी वस्त्र त्याग कर संन्यासियों का जीवन जिया। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा संदेश दिया। दूसरी ओर, वैरागी होने के बावजूद शिव कुबेर (धन के देवता) के स्वामी हैं और दक्षिण के कई शक्तिशाली, समृद्ध साम्राज्यों ने उनके भव्य मंदिरों का निर्माण कराया।
सियासत के लिए खतरनाक लकीर लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपनी हार-जीत के कारण खोजने का पूरा अधिकार है। कांग्रेस दक्षिण में मजबूत और उत्तर में कमजोर क्यों है, इसके राजनीतिक या संगठनात्मक कारण हो सकते हैं। लेकिन अपनी राजनीतिक स्थिति को सही ठहराने के लिए आराध्य देवों का 'अमीर-गरीब' या 'उत्तर-दक्षिण' में वर्गीकरण करना बेहद निंदनीय है।
भारत का आम नागरिक जब मंदिर जाता है, तो वह आर्य-द्रविड़ या अमीर-गरीब की पहचान के साथ नहीं, बल्कि केवल एक भक्त के रूप में जाता है। ऐसे में नेताओं द्वारा आस्था के केंद्रों को अपनी राजनीतिक बिसात का मोहरा बनाना समाज के लिए एक खतरनाक प्रयोग है।