पांचवीं तक पढ़ी लड़की नहीं पढ़ सकी हिंदी अखबार, हाईकाेर्ट ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
पांचवीं तक पढ़ी लड़की नहीं पढ़ सकी हिंदी अखबार, हाईकाेर्ट ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
प्रयागराज, 12 अक्टूबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाली लड़की के हिंदी अखबार न पढ़ पाने और अपने नाम के अलावा हिंदी में कुछ न लिख पाने पर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने सवाल उठाया कि लड़की की पढ़ाई पांचवीं कक्षा के बाद क्यों छूट गई और राज्य यह सुनिश्चित क्यों नहीं कर पाया कि वह आगे भी शिक्षा प्राप्त करती।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता गंभीर चिंता का विषय है। अदालत एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसका संबंध यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम ( पाक्सो एक्ट) 2012 के तहत लंबित मामले से था।
याचिकाकर्ता राकेश यादव उर्फ पप्पू ने उस लड़की को अदालत में पेश करने की मांग की थी, जिसके साथ उसके अनुसार वह वर्ष 2025 में घर से चला गया था। बाद में लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया।
5 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने लड़की की शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी ली। अदालत ने उससे पूछा कि क्या वह हिंदी का अखबार पढ़ सकती है। लड़की ने इसका जवाब न में दिया। जब उससे पूछा गया कि क्या वह अपना नाम लिख सकती है, तो उसने हां कहा। हालांकि, नाम के अलावा हिंदी में कुछ और लिखने के सवाल पर उसने असमर्थता जताई।
अदालत ने इस स्थिति पर हैरानी जताते हुए कहा कि रिकॉर्ड और राज्य के वकील के अनुसार लड़की पांचवीं कक्षा तक पढ़ी थी, इसके बावजूद वह अपनी मातृभाषा में अखबार नहीं पढ़ सकती। खंडपीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि लड़की ने बताया कि वह केवल हस्ताक्षर कर सकती है और हिंदी में इससे अधिक कुछ नहीं लिख सकती।
खंडपीठ ने सवाल किया कि लड़की की शिक्षा पांचवीं कक्षा तक ही क्यों सीमित रह गई। राज्य यह सुनिश्चित क्यों नहीं कर सका कि वह आगे पढ़ाई जारी रखती या कम से कम बारहवीं कक्षा तक स्कूल में बनी रहती।
अदालत ने कहा कि करीब 15 वर्ष की उम्र के बच्चे से अपने आचरण के कानूनी परिणामों और दायित्वों को समझने की अपेक्षा करने से पहले राज्य की जिम्मेदारी है कि उसे सार्थक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नाबालिग वयस्क होने तक शिक्षा से जुड़ा रहे, उसे व्यावसायिक कौशल हासिल करने के पर्याप्त अवसर मिलें और वह भविष्य में आत्मनिर्भर बन सके।
सुनवाई के दौरान अदालत ने लड़की के पिता से भी बातचीत की। पिता ने बताया कि वह निरक्षर हैं और कभी स्कूल नहीं गए। वह मजदूरी करके महीने में लगभग 10 से 12 हजार रुपये कमाते हैं। परिवार में कमाने वाले वह अकेले हैं। उन्हें अपने चार बच्चों, जिनकी अभी कमाई शुरू नहीं हुई है, के साथ-साथ बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है।
अदालत ने मामले की सामाजिक परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा कानून और संविधान से मिले अधिकारों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखता। ऐसे लोगों को अपने कानूनी कर्तव्यों, दायित्वों और उनके उल्लंघन के परिणामों की जानकारी होना भी जरूरी नहीं है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कानून की अनभिज्ञता उसके उल्लंघन का बचाव नहीं हो सकती। हालांकि, कानून लागू करते समय लोगों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
पाक्सो एक्ट में संशोधन पर विधि आयोग से सुझाव मांगे
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में विधि आयोग से पाक्सो एक्ट के उन प्रावधानों में उपयुक्त संशोधन सुझाने का अनुरोध किया, जो नाबालिगों के बीच संबंधों से जुड़े मामलों पर लागू होते हैं। अदालत ने कहा कि भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इस विषय की समीक्षा की जानी चाहिए। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि कुछ परिस्थितियों में कानून को सख्ती से लागू करने के परिणाम न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय अन्याय को बढ़ावा दे सकते हैं, खासकर तब, जब ऐसे संबंध से बच्चे का जन्म हो चुका हो। अदालत ने सुझाव दिया कि विधि आयोग इस बात पर विचार कर सकता है कि असाधारण परिस्थितियों में स्पेशल जज को सजा तय करते समय मामले की परिस्थितियों पर विचार करने का पर्याप्त विवेकाधिकार दिया जाए। आयोग से सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंडों की संभावना पर भी विचार करने को कहा गया, ताकि पाक्सो एक्ट की जानकारी के अभाव में बने परिवार को अनावश्यक रूप से बिखरने से बचाने के विकल्पों का आकलन किया जा सके। उम्र के आकलन के आधार पर लड़की को युवक के साथ जाने की अनुमति मामले में याचिकाकर्ताओं के अनुसार, दोनों घर से चले गए और उन्होंने 1 सितंबर 2025 को एक हलफनामा बनवाया, जिसमें स्वयं को पति-पत्नी बताया था। राज्य और लड़की के पिता ने उसकी जन्मतिथि 25 जुलाई 2010 बताई थी। बरामदगी के बाद लड़की को बाल गृह भेजा गया, जहां उसने बाद में बच्चे को जन्म दिया। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में न तो स्कूल की ओर से जारी जन्मतिथि का प्रमाणपत्र है और न ही नगर निकाय या पंचायत का जन्म प्रमाणपत्र। हालांकि, अस्थि परीक्षण के आधार पर लड़की की उम्र लगभग 18 वर्ष आंकी गई। किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 ( पाक्सो एक्ट) की धारा 94(2) का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने लड़की को वयस्क माना। चूंकि उसने युवक के साथ रहने की इच्छा जताई, इसलिए अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसे उसके साथ जाने की अनुमति दी।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पाक्सो मामले की सुनवाई कर रही विचारण अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की कार्यवाही के दौरान की गई तथ्यात्मक टिप्पणियों को लंबित आपराधिक मामले में आधार नहीं बनाएगी। विचारण अदालत को निर्देश दिया गया कि वह मामले का फैसला कानून के अनुसार और केवल उस कार्यवाही में पेश किए गए तथा दर्ज साक्ष्यों के आधार पर करे।