भविष्यदृष्टा सावरकर के सपनाें का भारत बनाने की जरूरत: डॉ. मुरार जी त्रिपाठी
महाराष्ट्र लोकसेवा मंडल में जयंती पर वीर सावरकर काे दी गई श्रद्धांजलि
प्रयागराज, 26 फ़रवरी । राष्ट्रीय स्वयंसेवक के प्रान्त प्रचार प्रमुख डॉ मुरारजी त्रिपाठी ने कहा कि वीर सावरकर भविष्यदृष्टा थे। उनके सपनों का भारत बनाने की जरूरत है। उनके जीवन-चरित को पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक के प्रान्त प्रचार प्रमुख डॉ त्रिपाठी गुरुवार काे अलोपीबाग स्थित महाराष्ट्र लोकसेवा मंडल में स्वातंत्र्य वीर सावरकर की पुण्यतिथि पर आयाेजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के मुख्यवक्ता डाॅ मुरारजी त्रिपाठी ने कहा कि उनके जीवन-चरित को पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने ब्रिटेन के इंडिया हाउस में ब्रिटिश सरकार को धराशाई करने के लिए क्रांतिकारियों को संगठित किया था। स्वतंत्र भारत में उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जिसके वास्तव में वे हकदार थे। उन्हें सम्मान देने की कौन कहे, उनका न केवल निरन्तर विरोध किया गया, अपितु निराधार-असत्य आरोप लगाए गए और उन्हें झूठे केस में फंसाया गया, जिसमें वे बाद में ससम्मान बरी किए गए थे। उनके सपनों का भारत बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कार्यक्रम में विचारक चारुमित्र पाठक ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि वीर सावरकर के संघर्षों की जीवन गाथा एक बार जो व्यक्ति पढ़ ले, वह कभी भी सावरकर का विरोध नहीं कर सकता, चाहे वह किसी वाद या दल से जुड़ा हो । वास्तव में लोग बगैर सावरकर को पढ़े अनर्गल आरोप लगाते हैं। ऐसे लोगों को न्यायालय ने बहुत ही माकूल जवाब दे दिया है। अब उन पर कीचड़ उछालना बंद कर देना चाहिए। मराठी में उनकी लिखी हुई कई पुस्तकें उनके जीवन काल में ही कुछ लोगों के विरोध के बावजूद उनके प्रति जन-समुदाय के आत्मिक भाव के कारण पुरस्कृत हुई थीं। पाठक ने कहा कि उन्हें दो जन्म का कारावास मिलने पर कांग्रेस के एक विदेशी प्रतिनिधि ने अफसोस जताया था, जबकि उसके विपरीत कांग्रेस के कई भारतीय नेताओं ने उनके विरुद्ध टिप्पणी की थी। वे युवकों में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे। उनकी जीवनगाथा पढ़ने का अवसर नई पीढ़ी को अवश्य दिया जाना चाहिए।
इस माैके पर पूर्व प्रधानाचार्या आशा बेहेरे ने कहा कि वीर सावरकर त्याग, तपस्या एवं संघर्ष के पर्याय थे। उनके पद चिन्हों पर चलने की जरूरत है। वे कहा करते थे, मृत्यु हारी है, मैं नहीं हारा हूँ। वस्तुतः इसे उन्होंने अपने असाधारण व्यक्तित्व-कर्तृत्व से सिद्ध भी कर दिया।
संयोजक व्रतशील शर्मा ने कहा कि सावरकर ने अपने काम से अपने नाम को सार्थक कर जन-जन में 'वीर सावरकर' के रूप में समादृत हुए हैं और आगे भी रहेंगे। शर्मा ने प्रयागराज में स्वातंत्र्यवीर की प्रतिमा लगाने और उनकी आगामी जयन्ती पर उनकी कृति पर केन्द्रित सार्थक चर्चा कराने की जरूरत पर जाेर
दिया। संघ के भाग सेवा प्रमुख विभूति द्विवेदी ने कहा कि वीर सावरकर का हिंदुत्व का चिंतन कालजयी है। देश पर मर मिटने वालों के लिए उन्होंने हुतात्मा शब्द का प्रयोग किया था। उनके विचारों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
लोक सेवा मंडल के आलोक पौराणिक ने आभार ज्ञापन किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में भगवान गणपति, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा सावरकरजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। इस अवसर पर राजीव कुमार शर्मा, दिलीप सप्रे, अनन्त अग्निहोत्री, विकास तिवारी सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे ।