वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर प्रशासन धर्म परिवर्तन नहीं रोक सकता : हाईकोर्ट

वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर प्रशासन धर्म परिवर्तन नहीं रोक सकता : हाईकोर्ट

वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर प्रशासन धर्म परिवर्तन नहीं रोक सकता : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 28 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। स्पष्ट किया है कि यदि अधिनियम की धारा 8 एवं 9 के अंतर्गत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन कर लिया गया हो, तो प्रशासनिक अधिकारी अनिश्चितकालीन जांच, संदेह या व्यक्तिगत संतुष्टि के आधार पर किसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन अथवा धार्मिक पहचान को बाधित नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति इन्द्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जो वर्ष 2022 से लम्बित थी। याचिका डॉ. मोहम्मद एहसान उर्फ अनिल पंडित द्वारा दाखिल की गई थी, जो प्रयागराज स्थित सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज में अंग्रेजी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उन्होंने सनातन धर्म अपनाने की वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण कर ली थी, बावजूद इसके प्रशासनिक स्तर पर उनके धर्म परिवर्तन को मान्यता नहीं दी जा रही थी। याची की पत्नी बलिया के राजकीय इंटर कॉलेज में अंग्रेजी विषय की प्रवक्ता हैं।

प्रशासनिक अस्वीकार्यता के चलते दम्पत्ति को विवाह पंजीकरण, पहचान पत्र, शासकीय अभिलेखों और अन्य वैधानिक अधिकारों से संबंधित गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। इससे उनकी वैवाहिक पहचान एवं भविष्य के पारिवारिक अधिकारों पर भी अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

मामले में याची की ओर से दलील दी गई कि प्रशासनिक अधिकार संविधान प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकते तथा वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद प्रशासनिक अड़चनें विधिसम्मत नहीं मानी जा सकतीं।

हाईकोर्ट ने अपने पूर्व आदेश 05 मई 2026 में कहा था कि अधिनियम की धारा 8(1) के अंतर्गत आवश्यक घोषणा पूर्व में ही प्रस्तुत की जा चुकी थी तथा प्रथम दृष्टया वैधानिक प्रक्रिया का अनुपालन किया गया था। न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), प्रयागराज ने 14 मई 2026 को अंतिम आदेश पारित करते हुए याची के धर्म परिवर्तन आवेदन को स्वीकार कर लिया।

इसके बाद 27 मई 2026 को पारित अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा 9(6) के अंतर्गत समस्त परिणामी वैधानिक कार्यवाहियां चार सप्ताह के भीतर पूर्ण करने का निर्देश दिया।