बीएचयू में बौद्ध धर्म पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, 24 राज्यों से आए विद्वान

— प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के शताब्दी वर्ष का उत्सव

बीएचयू में बौद्ध धर्म पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, 24 राज्यों से आए विद्वान

वाराणसी, 10 मार्च। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कला संकाय के अंतर्गत प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के शताब्दी वर्ष समारोह में मंगलवार से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरूआत हुई। परिसर स्थित केएन उड़प्पा सभागार में आयोजित “दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म का अन्वेषण: विस्तार, पुरातत्त्व, कला एवं वास्तुकला तथा सांस्कृतिक प्रभाव” विषयक सम्मेलन में विभाग की उपलब्धियों को बताया गया।

सम्मेलन में जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, श्रीलंका, म्यांमार, वियतनाम और नेपाल सहित विश्व के विभिन्न देशों तथा भारत के 24 राज्यों से आए विद्वानों ने भागीदारी की। उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बीएचयू कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने शताब्दी वर्ष को उपलब्धि के साथ-साथ आत्ममंथन का अवसर बताया। उन्होंने संकाय सदस्यों को आगामी पच्चीस वर्षों के लिए महत्वाकांक्षी शैक्षणिक एवं शोध लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करते हुए विभाग की बौद्धिक परंपरा को और सुदृढ़ बनाने पर बल दिया। जिसमें विभाग के बौद्धिक योगदान को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित करने तथा आत्ममंथन, सुधार के क्षेत्रों की पहचान करने और सामूहिक रूप से शैक्षणिक एवं शोध उत्कृष्टता को मजबूत करने की दिशा में कार्य करने के अवसरों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के विचार भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्व एशिया सहित विश्व के अनेक क्षेत्रों में आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। विशिष्ट अतिथि जापान फाउंडेशन के महानिदेशक कोजी सातो ने भारत से जापान और एशिया के अन्य देशों तक बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक प्रसार का उल्लेख करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म एशियाई समाजों के बीच सांस्कृतिक संवाद, कलात्मक परंपराओं और साझा सभ्यतागत मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला सेतु है। उन्होंने भारत-जापान शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की भूमिका की सराहना की। विशेष अतिथि भिक्खु चन्दिमा महाथेरो ने बौद्ध धर्म की उत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में भगवान बुद्ध के ज्ञानोदय से प्रारम्भ होकर यह धर्म सम्राट अशोक तथा अन्य संरक्षकों के प्रयासों से दक्षिण एशिया और विश्वभर में फैलता गया, जिसने कला, संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया।

मुख्य वक्ता प्रो. वाई. एस. अलोन, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने कहा कि बौद्ध धर्म को केवल अनुष्ठानिक धर्म के रूप में नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक परंपरा के रूप में समझा जाना चाहिए। उन्होंने धर्मकीर्ति जैसे बौद्ध दार्शनिकों के बीच हुए शास्त्रीय वाद-विवादों का उल्लेख करते हुए बौद्ध चिंतन की बौद्धिक परंपरा की चर्चा की। बौद्ध धर्म में सुख और दुःख की अवधारणा विषय पर यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो, अमेरिका के डॉ. फ्रेडरिक एल. कूलिज ने विशेष व्याख्यान दिया। उद्घाटन सत्र का प्रमुख आकर्षण तीन प्रकाशनों का लोकार्पण रहा, जिनमें सम्मेलन सार-पुस्तिका, वर्ष 1956–57 से प्रकाशित विभागीय सहकर्मी-समीक्षित,भारती(48वाँ खंड) तथा “वास्तविक बुद्ध एवं जातक कथाएँ” शामिल हैं।

विभागाध्यक्ष प्रो. एम. पी. अहिरवार ने छह देशों-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों और प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म के अध्ययन की यह विषयवस्तु इसके ऐतिहासिक, दार्शनिक, कलात्मक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझने का महत्वपूर्ण बौद्धिक मंच प्रदान करती है तथा अंतर्विषयी संवाद को प्रोत्साहित करती है। सम्मेलन की संयोजक प्रो. सुजाता गौतम ने बताया कि लगभग 300 अब्स्त्रक्ट्स प्राप्त हुए, जिनमें से 160 शोधपत्रों का चयन समानांतर एवं ऑनलाइन सत्रों में प्रस्तुति हेतु किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता संकाय प्रमुख, कला संकाय प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने की। संचालन डॉ. विकास कुमार सिंह ने किया।