भारतीय लोग अपनी पुरानी ज्ञान परम्परा को बढ़ावा नहीं दे पा रहे: प्रो केबी पाण्डेय

भारतीय लोग अपनी पुरानी ज्ञान परम्परा को बढ़ावा नहीं दे पा रहे: प्रो केबी पाण्डेय

भारतीय लोग अपनी पुरानी ज्ञान परम्परा को बढ़ावा नहीं दे पा रहे: प्रो केबी पाण्डेय

प्रयागराज, 30 मई। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, झूंसी में शनिवार को दो दिवसीय भारतीय ज्ञान मंथन कार्यशाला शुरू हुई। जिसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणाली विश्वकोश का निर्माण है। उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. केबी पांडे ने कहा कि विडम्बना है कि भारतीय ज्ञान को हम भारत में ही ढूंढ रहे हैं। आयुर्वेद सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है।

उन्होंने आगे कहा कि इसी तरह से हर भारतीय विषय सबसे पुराने हैं। अमेरिका अंतरिक्ष शोध संस्थान नासा की प्रतिष्ठा भारतीय वैज्ञानिकों के कारण ही है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने स्वयं स्वीकार किया था कि विश्व की अधिकतम शोध भारतीय पुरातन ज्ञान पर आधारित है। लेकिन दुःख की बात है भारतीय लोग ही अपनी पुरानी ज्ञान परम्परा को बढ़ावा नहीं दे पा रहे हैं। सत्र के अंत में डा. चंद्रैया गोपानी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

छपरा विश्वविद्यालय बिहार के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि अग्रेजों ने एशियाटिक सोसायटी नामक संस्था स्थापित की। जिसका मुख्य कार्य भारतीयों की संस्कृति को निम्न दर्शाना था। भारत का पुरातन ज्ञान विज्ञान की दुनिया में मील का पत्थर है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि विभाग के संकायाध्यक्ष प्रो. आदेश कुमार ने कहा कि भारत का संविधान भारतीय परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यूनाइटेड नेशन्स भी भारतीय पंच परम्परा पर काम करती है। भारतीय न्याय व्यवस्था में दिन-प्रतिदिन लम्बित केस बढ़ते जा रहे हैं। पश्चिम की संस्कृति से प्रेरित न्याय व्यवस्था असफल हो रही है।

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज की सलाहकार कल्पना सहाय ने कहा कि कालीदास के कृतित्व का अनुवाद इतिहासवेक्ता मैक्स मूलर ने किया है। जिससे कालीदास की कृतियों को काफी महत्वं मिला। वहीं, कालीदास की हिंदी में अनुवादित कृतियों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। भारत के चारों वेद ही वास्तव में सभी विषयों के ज्ञान का भंडार हैं।

विशिष्ट वक्ता जीएस तोमर ने कहा कि भारतीय संस्कृति आरोग्य और सम्पूर्ण कल्याण की बात करती है। ऋग्वेद में प्रमुख बीमारियों का वर्णन युगों पहले ही कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि सदियों पहले ही महर्षि सुश्रुत ने सर्जरी को जन्म दिया था।

दूसरे सत्र में डॉ. आरसी पाल, डॉ. साधना श्रीवास्तव, डॉ. दामिनी श्रीवास्तव, डॉ. राजेश शास्त्री, डॉ. शिल्पशिखा, डॉ. अनूप, संतोष कुमार शुक्ल, प्रो. छत्रसाल सिंह, डॉ. विनोद कुमार गुप्त, डॉ. शैलेंद्र कुमार और डॉ. रमा शंकर सिंह आदि ने अपने विचार रखे।

अंत में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारत का आदिग्रंथ वेद स्वयं में एक इनसाक्लोपीडिया है। यहां प्रत्येक वक्ता के विचार भारतीय ज्ञान परम्परा के शब्दकोश के सृजन में अहम साबित होंगे। उन्होंने कहा कि भारत में हर प्रसंग के दौरान दर्शन शास्त्र लिखने की विधा रही है। युद्ध के दौरान भी स्मृतियां लिखी गईं हैं। वर्तमान में विज्ञान बाईनरी सिस्टम यानी जीरो और वन पर ही केंद्रित है लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा में बाइनरी सिस्टम से कहीं आगे की खोज सदियों पहले ही हो चुकी थी।

उन्होंने कहा कि भाषाएं तो आपस में जोड़ती हैं, परस्पर संवाद स्थापित करती हैं। भारतीय वेद लिखित से पहले ध्वनि में ही उपलब्ध थे। भारतीय वाक परम्परा में ज्ञान मंत्रों और छन्दों मेें उपलब्ध है। भारतीय ज्ञान विषयों में नहीं बंटा था, धर्म, विज्ञान और तकनीक आपस में जुड़े हुए हैं।

तीसरे सत्र में प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रवीण शेखर, रमाशंकर, डॉ. लेखराम धन्नाना, हरेंद्र प्रताप, प्रो. ऋषीकांत पांडे ने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के डॉ. अर्चना सिंह, डॉ. चंद्रैया गोपानी, डॉ. सुभाष कुमार, डॉ. मानिक कुमार, डॉ. रेवा सिंह आदि मौजूद रहे।

31 को होगा भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र का उद्घाटन इविवि के डॉ अमित कुमार शर्मा ने बताया कि गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, झूंसी में दो दिवसीय भारतीय ज्ञान मंथन कार्यशाला के दूसरे दिन तीन सत्र आयोजित किए जाएंगे। अंतिम सत्र में संस्थान में भारतीय ज्ञान परम्परा कें्रद का उद्घाटन होगा। उत्तर प्रदेश के परिवहन राज्य मंत्री दया शंकर सिंह, प्रो. राजेंद्र सिंह विश्वविद्यालय प्रयागराज के कुलपति प्रो. अखिलेश कुमार सिंह और संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह भी केंद्र के उद्घाटन कार्यक्रम का हिस्सा होंगे।