बलिया हत्याकांड: 16 साल बाद हाईकोर्ट से तीनों दोषी बरी, ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा
बलिया हत्याकांड: 16 साल बाद हाईकोर्ट से तीनों दोषी बरी, ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा
प्रयागराज, 15 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 2008 के एक चर्चित हत्या मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए दोषी करार दिए गए दो आरोपियों धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह को बरी कर दिया है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने बुधवार को यह फैसला आपराधिक अपील की सुनवाई करते हुए सुनाया।
13 मार्च 2008 को जनपद बलिया के थाना रसड़ा क्षेत्र में सुजुल गांव के पास एक सड़क दुर्घटना/हत्या की घटना हुई थी। प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसार, वेद प्रकाश सिंह अपने साथियों मयंक सिंह उर्फ निक्कू सिंह और राहुल गुप्ता उर्फ गुड्डू गुप्ता के साथ मोटरसाइकिल पर बी.ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा देने जा रहे थे।
आरोप था कि अंकुर सिंह उर्फ शेरू सिंह (जिनकी अपील के दौरान मृत्यु हो गई), यशवंत सिंह, धनुषधारी सिंह और अन्य ने बोलेरो गाड़ी से मोटरसाइकिल को कुचल दिया, जिससे वेद प्रकाश सिंह की मौके पर मौत हो गई और अन्य दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस के अनुसार, विवाद की जड़ 25,000 रुपये का लेन-देन था, जो वेद प्रकाश सिंह ने मोटरसाइकिल खरीदने के लिए अंकुर सिंह को दिए थे।
बलिया की सत्र अदालत ने 4 जून 2010 को अपने फैसले में अग्निवेश सिंह उर्फ मान सिंह को बरी कर दिया था, जबकि अंकुर सिंह उर्फ शेरू सिंह, यशवंत सिंह और धनुषधारी सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 307, 504, 506 और 427 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और अन्य सजाएं सुनाई थीं।
तर्क दिया गया कि घटना में घायल हुए तीन प्रत्यक्षदर्शी मयंक सिंह, राहुल गुप्ता और चंदन गुप्ता को अभियोजन पक्ष ने गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया, जबकि वे इस मामले के सबसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण गवाह थे। इसके अलावा दो गवाहों मदन सिंह और चंद्र सेन सिंह का नाम एफआईआर में नहीं था और उनके बयान घटना के आठ महीने बाद दर्ज किए गए थे।
खंडपीठ ने पाया कि सूचनाकर्ता दिग्विजय सिंह सहित सभी तथाकथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही में गंभीर विसंगतियां थीं और घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति ही संदिग्ध प्रतीत होती है। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि अभियोजन पक्ष ने घायल गवाहों मयंक सिंह और राहुल गुप्ता को पेश न करके भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के दृष्टांत (छ) के तहत प्रतिकूल अनुमान को आमंत्रित किया।
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर जमील अहमद की गवाही में यह भी सामने आया कि शव पर न तो गाड़ी के टायर के निशान थे और न ही घसीटे जाने के कोई चिह्न, जो अभियोजन की इस कहानी का खंडन करता है कि आरोपी ने गाड़ी शव के ऊपर चढ़ाई थी। अदालत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही और मेडिकल साक्ष्य में स्पष्ट विरोधाभास है।
खंडपीठ ने कहा कि केवल गवाहों की बयानों में एकरूपता होना उनकी सत्यता की गारंटी नहीं है, और यदि घटनास्थल पर गवाहों की उपस्थिति ही संदिग्ध हो तो उनकी गवाही खारिज की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को "अपुष्ट और विधि के विपरीत" करार देते हुए दोनों अपीलों को स्वीकार कर लिया और 4 जून 2010 के दोषसिद्धि व सजा के आदेश को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह, जो जमानत पर थे, के बॉन्ड रद्द कर दिए गए और जमानतदारों को उनके दायित्व से मुक्त कर दिया गया।
उल्लेखनीय है कि मुख्य आरोपी अंकुर सिंह उर्फ शेरू सिंह की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो जाने के कारण उनकी अपील घोषित की जा चुकी थी।