शिक्षा मंत्री प्रधान ने विद्यालयों में एसएमसी पर नए दिशा-निर्देश किए जारी, माध्यमिक स्तर तक विस्तार और पारदर्शिता पर खास जोर
शिक्षा मंत्री प्रधान ने विद्यालयों में एसएमसी पर नए दिशा-निर्देश किए जारी, माध्यमिक स्तर तक विस्तार और पारदर्शिता पर खास जोर
नई दिल्ली, 06 मई । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को विद्यालय प्रबंधन समितियों (एसएमसी) के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए। इन दिशानिर्देशों में पहली बार माध्यमिक स्तर तक एसएमसी का विस्तार, एक महीने के भीतर गठन की अनिवार्यता और पारदर्शी कार्यप्रणाली जैसे कई अहम बदलाव किए गए हैं।
स्कूल प्रबंधन समिति के दिशानिर्देशों को जारी करते हुए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए, हमारे देश में लगभग 15 लाख स्कूल हैं। इन सभी स्कूलों में, स्कूल प्रबंधन समिति छात्रों, शिक्षकों और समाज के बीच एक सेतु का काम करेगी। हम शिक्षा और स्कूल प्रबंधन को समाज के हाथों में सौंपने का प्रयास कर रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने विद्यालय प्रबंधन समितियों (एसएमसी) को लेकर व्यापक संशोधित दिशा-निर्देश 2026 जारी किए हैं, जो पहले जारी सभी गाइडलाइंस को प्रतिस्थापित करेंगे।
नए निर्देशों में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब एसएमसी केवल प्राथमिक स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कक्षा 12 तक के माध्यमिक विद्यालयों में भी लागू की जाएगी। इसके साथ ही विद्यालय प्रबंधन विकास समिति (एसएमडीसी) की जगह एसएमसी को लागू करने का प्रावधान किया गया है।
दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक विद्यालय में शैक्षणिक सत्र शुरू होने के एक महीने के भीतर एसएमसी का गठन करना अनिवार्य होगा।
समिति के सदस्यों की संख्या बच्चों के नामांकन के आधार पर निर्धारित की जाएगी। अधिकतम 100 विद्यार्थी पर 12-15 सदस्य, 100-500 विद्यार्थी पर 15-20 सदस्य और 500 से अधिक विद्यार्थी पर 20-25 सदस्यों की अनुमानित संख्या निर्धारित की जा सकेगी।
एसएमसी के सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा। किसी सदस्य को एक और कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त किया जा सकता है लेकिन एक सदस्य लगातार दो कार्यकाल से अधिक कार्य नहीं कर सकता, सिवाय सदस्य सचिव के जोकि स्कूल के प्राचार्य होंगे।
एसएमसी के गठन के बाद नई समिति की पहली बैठक अगले कार्यदिवस या अधिकतम एक सप्ताह के भीतर आयोजित की जा सकती है। पहली बैठक में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा।
नई व्यवस्था में समिति की संरचना को अधिक समावेशी बनाया गया है। इसमें 75 प्रतिशत सदस्य बच्चों के अभिभावक या संरक्षक होंगे, जबकि शेष 25 प्रतिशत में स्थानीय प्राधिकरण, शिक्षक, शिक्षाविद्, विषय विशेषज्ञ, अकादमिक, वरिष्ठ एवं पूर्व विद्यार्थी और समुदाय के अग्रिम कार्यकर्ता जैसे आंगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ता और सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) जो विद्यालय के आसपास कार्यरत हों।
महिला भागीदारी को बढ़ावा देते हुए समिति में कम से कम 50 प्रतिशत महिलाओं का होना अनिवार्य किया गया है। साथ ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के अभिभावकों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।
पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए अब एसएमसी की नियमित मासिक बैठक अनिवार्य होगी और बैठक के एजेंडा, उपस्थिति और निर्णयों का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा। इसके अलावा, विद्यालय रिपोर्ट कार्ड (यूडीआईएसई+) को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का भी प्रावधान जोड़ा गया है।
नए दिशा-निर्देशों में एसएमसी की भूमिका को भी विस्तारित किया गया है। अब समिति केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि स्कूल विकास योजना (एसडीपी) तैयार करने, सीएसआर के जरिए संसाधन जुटाने, ड्रॉपआउट बच्चों को मुख्यधारा में लाने और आधारभूत साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (एफएलएन) लक्ष्यों को हासिल करने में सक्रिय भूमिका निभाएगी।
इसके अलावा, दो नई उप-समितियों—विद्यालय भवन समिति और शैक्षणिक समिति—के गठन का प्रावधान किया गया है, जिससे कार्यों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।
सरकार का मानना है कि इन नए दिशा-निर्देशों से स्कूलों में सामुदायिक भागीदारी बढ़ेगी, पारदर्शिता मजबूत होगी और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार
उल्लेखनीय है कि विद्यालय प्रबंधन समिति, विद्यालय संचालन की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। इसके प्रमुख कार्यों में विद्यालय के समग्र कार्यों की निगरानी और शेक्षणिक योजनाओं जैसे समग्र शिक्षा योजना, पीएम श्री और पीएम पोषण के समयबद्ध और प्रभावी कार्यान्वयन की देख-रेख शामिल हैं।