हाईकोर्ट ने 2,161 करोड़ के कथित शराब घोटाले में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त को दी जमानत

हाईकोर्ट ने 2,161 करोड़ के कथित शराब घोटाले में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त को दी जमानत

हाईकोर्ट ने 2,161 करोड़ के कथित शराब घोटाले में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त को दी जमानत

प्रयागराज, 16 जुलाई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2,161 करोड़ के कथित छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से जुड़ी उत्तर प्रदेश की एफआईआर में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को ज़मानत दे दी। जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने कहा: "अगर आरोपी ज़मानत का हकदार है तो उसे सिर्फ़ आपराधिक इतिहास के आधार पर ज़मानत देने से मना नहीं किया जा सकता। आरोपी को ज़मानत देने से मना करने के लिए आपराधिक इतिहास के आधार पर कोई खास वजह नहीं बताई गई। इसलिए कोर्ट को यह सही नहीं लगता कि सिर्फ़ इस आधार पर कि उनका आपराधिक इतिहास रहा है, आवेदक को ज़मानत देने से मना किया जाए।"

अभियोजन पक्ष के अनुसार, निरंजन दास छत्तीसगढ़ के आबकारी आयुक्त थे और राज्य की आबकारी नीति और टेंडर प्रक्रिया तैयार करने में शामिल थे। आरोप है कि उन्होंने ऐसी नीति बनाई जिससे नोएडा की होलोग्राम बनाने वाली कंपनी मेसर्स प्रिज्म होलोग्राफी सिक्योरिटी फिल्मस प्राइवेट लिमिटेड को फ़ायदा हुआ। कोर्ट ने गौर किया कि 2,161 करोड़ के कथित शराब घोटाले के सिलसिले में राज्य की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग/एंटी-करप्शन ब्यूरो, रायपुर (छत्तीसगढ़) ने शुरू में आवेदक समेत 70 से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत एफआईआर दर्ज की थी।

आवेदक ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मई 2026 में छत्तीसगढ़ मामले में ज़मानत दी। यह भी बताया गया कि प्रवर्तन निदेशालय ने नोएडा में होलोग्राम बनाने के बारे में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को जानकारी दी थी, जिसके बाद यूपी में यह एफ आई आर दर्ज की गई। यह तर्क दिया गया कि घोटाले में कथित तौर पर शामिल अन्य लोगों को भी ज़मानत मिल गई। यह भी बताया गया कि चार्जशीट में 22 गवाहों के नाम शामिल थे, जिससे पता चलता है कि मुक़दमा जल्द पूरा नहीं होगा।

कोर्ट ने पाया कि राज्य ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे पता चले कि आवेदक ने कभी क़ानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की हो। सिर्फ़ आपराधिक इतिहास के आधार पर ज़मानत से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मानते हुए कोर्ट ने कहा: "कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि ज़मानत का मकसद ट्रायल के दौरान आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करना है। राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने ऐसी कोई ठोस जानकारी या परिस्थितियां नहीं दिखाई हैं, जिनसे यह संकेत मिले कि आवेदक न्याय से भाग सकता है, न्याय की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, या अपराध दोहराने, गवाहों को डराने-धमकाने जैसी कोई और परेशानी खड़ी कर सकता है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य ने ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दिखाया, जिससे यह लगे कि आवेदक सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, गवाहों को डरा-धमका सकता है या ज़मानत की आज़ादी का गलत इस्तेमाल कर सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मुख्य अपराध छत्तीसगढ़ में हुआ बताया गया, आवेदक को मुख्य मामले में सुप्रीम कोर्ट से पहले ही ज़मानत मिल चुकी थी, यूपी के मौजूदा मामले में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट में 22 गवाहों के नाम हैं, हाईकोर्ट ने उसे ज़मानत दी।