हाईकाेर्ट : फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने वाले बंदी रक्षक की बर्खास्तगी बरकरार
हाईकाेर्ट : फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने वाले बंदी रक्षक की बर्खास्तगी बरकरार
प्रयागराज, 22 जुलाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को मुरादाबाद जेल के बर्खास्त बंदी रक्षक रणवीर सिंह की बहाली के एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है।
रणवीर सिंह को 8 अगस्त 1992 को अनुसूचित जनजाति आरक्षित श्रेणी के तहत बंदी रक्षक नियुक्त किया गया था। 2007 में कुछ कर्मचारियों द्वारा फर्जी आदेशों के आधार पर तबादला मांगे जाने के बाद जेल प्रशासन ने सभी दस्तावेजों की जांच के आदेश दिए। जांच में सामने आया कि सिंह का जाति प्रमाण पत्र तहसीलदार, लखनऊ द्वारा जारी ही नहीं किया गया था। यह पूरी तरह फर्जी था। मैनपुरी में भी पुष्टि हुई कि उनके गांव में "लोध" जाति का कोई व्यक्ति नहीं रहता। इसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया गया और 28 नवंबर 2007 को बर्खास्त कर दिया गया।
2008 में एकलपीठ ने बर्खास्तगी रद्द करते हुए कहा था कि बिना विभागीय जांच के कार्रवाई गलत थी, और यह भी माना कि "लोध" व "लोधी" एक ही जाति के नाम हैं, इसलिए याची अनुसूचित जनजाति का हकदार है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि एकलपीठ ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जाति के मुद्दे पर फैसला दिया, जबकि यह अधिकार "सेवा मामलों" तक सीमित था। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी से हासिल नियुक्ति शुरू से ही अवैध मानी जाती है, और ऐसे मामलों में अनुच्छेद 311 के तहत सुरक्षा नहीं मिलती। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि "फ्रॉड सब कुछ खत्म कर देता है"
हाईकोर्ट ने एकलपीठ का आदेश रद्द कर बर्खास्तगी बरकरार रखी। हालांकि अपील की सुनवाई के दौरान याची ने बिना किसी अंतरिम आदेश के काम किया था, इसलिए उसे दिया गया वेतन वापस नहीं लिया जाएगा।