निवारक नजरबंदी को जमानत आदेशाें को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता इस्तेमाल : हाईकोर्ट

एन डी पी एस में नजरबंद विजय गोयल की तत्काल रिहाई का निर्देश

निवारक नजरबंदी को जमानत आदेशाें को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता इस्तेमाल : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 07 जुलाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने आगरा निवासी विजय गोयल की निवारक नजरबंदी को रद्द करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

याची विजय गोयल के खिलाफ एन डी पी एस एक्ट (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज एक्ट) से जुड़े चार मामलों के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव ने 1 अगस्त 2025 को निवारक नजरबंदी का आदेश जारी किया था। हैरानी की बात यह रही कि सभी चारों मामलों में विजय गोयल को हाईकोर्ट से पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि 21 अक्टूबर 2024 को उन्हें जबरन गाड़ी से रोककर अवैध रूप से हिरासत में लिया गया था, और बाद में झूठे तरीके से गिरफ्तारी दिखाई गई, जबकि सीसीटीवी फुटेज में पूरी घटना दर्ज है। यह भी आरोप लगाया गया कि जब्त सामग्री दरअसल एलोपैथिक दवाएं थीं, जो ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के दायरे में आती हैं,, जिन्हें रखना अपराध नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति के खिलाफ नजरबंदी आदेश तभी वैध माना जा सकता है जब हिरासत अधिकारी के पास ठोस सामग्री हो कि रिहा होने पर व्यक्ति फिर वैसी ही गतिविधियों में लिप्त होगा। कोर्ट ने पाया कि न तो जिला मजिस्ट्रेट, न केंद्र सरकार और न ही सलाहकार बोर्ड ने कोई तर्कसंगत आदेश पारित किया।सभी आदेशों में न्यायिक विवेक के प्रयोग का अभाव पाया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निवारक नजरबंदी को जमानत आदेशों को निष्प्रभावी करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।