बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का संतुलित दृष्टिकोण, सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी
डॉ. निवेदिता शर्मा के विचार: बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करने के बजाय चाइल्ड मोड, सुरक्षित प्रोफाइल और प्रभावी निगरानी जैसे उपाय अपनाने की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट की 2026 की बेंच (जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन) ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुंच और उसके उपयोग का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि बच्चों को उनकी उम्र के बावजूद ये अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि छोटे बच्चों में कोई चेतना या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती। सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
न्यायालय ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय चाइल्ड मोड, मजबूत सीएसईएएम (बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री) पहचान-हटाने की व्यवस्था, माता-पिता की सहमति और निजी प्रोफाइल जैसे उपाय सुझाए। यह निर्णय अनुराधा भसीन (2020) और प्रज्ञा प्रसून (2025) जैसे पूर्व निर्णयों की पृष्ठभूमि में आया है। यहां उपयोगकर्ता के एंगल से यह बात महत्वपूर्ण है कि यदि बच्चों के हित में इंटरनेट के सीमित या नियंत्रित उपयोग का सुझाव सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य हो जाए, तब भी यह देश के उज्ज्वल भविष्य के हित में हो सकता है। पूर्ण प्रतिबंध नकारात्मक हो सकता है, लेकिन जिम्मेदार, आयु-उपयुक्त और सुरक्षा-केंद्रित पहुंच भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश, शिक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है।
वैश्विक नियामक परिदृश्य और सबक
वैसे यह सच है कि 2025-2026 में दुनिया भर में बच्चों के सोशल मीडिया और इंटरनेट उपयोग पर प्रतिबंधों की लहर आई है। ऑस्ट्रेलिया दिसंबर 2025 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (TikTok, Instagram, Facebook, YouTube आदि) पर खाते बनाने पर प्रतिबंध लागू करने वाला पहला देश बना। प्लेटफॉर्म्स को उम्र सत्यापन के उचित कदम उठाने होंगे, अन्यथा भारी जुर्माना।
यूनाइटेड किंगडम ने जून 2026 में 16 वर्ष से कम उम्र के लिए समान प्रतिबंध की घोषणा की, जोकि 2027 तक लागू होने की संभावना है। यूरोपीय संघ का Kids Act प्रस्ताव 13 वर्ष से कम पर पूर्ण प्रतिबंध और 15 वर्ष से कम पर सीमित खातों की बात करता है। इंडोनेशिया (16 वर्ष), मलेशिया (16 वर्ष), ब्राजील, यूएई (15 वर्ष) और अन्य देशों ने भी विभिन्न रूपों में आयु सीमा लागू या प्रस्तावित की है। चीन में माइनर मोड के जरिए स्क्रीन टाइम और ऐप-विशिष्ट प्रतिबंध पहले से ही उपयोग में लिया जा रहा है।
इन उठाए गए तमाम कदमों को देखने पर पता चलता है कि ये सभी कदम मानसिक स्वास्थ्य, साइबर बुलिंग, लत और यौन शोषण की चिंताओं से प्रेरित हैं।
भारत का विशिष्ट संदर्भ और राष्ट्रीय हित
भारत में डिजिटल पहुंच तेजी से बढ़ी है, लेकिन उपयोग और कौशल में बड़ी खाई है। ASER 2024 के अनुसार, 14-16 वर्ष के ग्रामीण बच्चों में से लगभग 90 प्रतिशत के घर में स्मार्टफोन है और 82 प्रतिशत उपयोग करना जानते हैं, लेकिन केवल 57फीसद शैक्षिक कार्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि 76फीसद सोशल मीडिया के लिए। व्यक्तिगत स्वामित्व लड़कों (36%) में लड़कियों (27%) से अधिक है। स्कूलों में स्थिति और खराब है, यहां लगभग 25-64 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में कार्यात्मक कंप्यूटर और इंटरनेट है, राज्यवार भारी असमानता है। NSSO और अन्य सर्वेक्षण बताते हैं कि युवाओं में बेसिक इंटरनेट कौशल (सर्च, ईमेल, ट्रांजैक्शन) केवल 25-30 फीसद के आसपास है, ग्रामीण महिलाओं में और कम प्रतिशत में यह देखने को मिलता है।
DPDP Act 2023 में 18 वर्ष से कम को बच्चा माना गया है और उनके डेटा प्रोसेसिंग के लिए सत्यापित माता-पिता की सहमति अनिवार्य है (नियम 2027 से पूर्ण लागू होने की संभावना)। यह वैश्विक मानकों से अधिक सख्त है, जहां अक्सर 13-16 वर्ष की सीमा है। भारत का AadhaarDigiLocker सिस्टम उम्र सत्यापन के लिए उपयोगी है, हमारे यहां 18 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चे हैं और ये सभी बाल अधिकार संरक्षण देखरेख के अंतर्गत आते हैं।
भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है। हम ये मानते भी हैं कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, एआई, स्टार्टअप और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए डिजिटल रूप से साक्षर पीढ़ी जरूरी है। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के लिए यह अपरिहार्य भी है, किंतु इस कारण से हम अपने बच्चों को खुला भी नहीं छोड़ सकते हैं कि वह जो चाहें वह देखें और समझें, इसलिए समझदारी बेहद जरूरी है।
ऐसे में अभी सामने आया सुप्रीम कोर्ट का संतुलित दृष्टिकोण भारत के हित में है। पूर्ण प्रतिबंध “असिद्ध उपायों की सिद्ध असंगति” है, जैसा अदालत ने कहा। वैश्विक अनुभव से पता चलता है कि प्रतिबंध प्रभावी रूप से लागू करना कठिन है और अनियमित स्थानों को बढ़ावा दे सकता है। दूसरी ओर, चाइल्ड मोड, डिफॉल्ट प्राइवेट प्रोफाइल, अज्ञात वयस्कों से संदेश प्रतिबंध, मजबूत सामग्री मॉडरेशन और सीएसईएएम हटाने की तेज व्यवस्था बच्चों को सुरक्षित रखते हुए पहुंच बनाए रखती है।
वैश्विक साक्ष्य दिखाते हैं कि समस्या “कितना समय” से अधिक “क्या सामग्री और कैसे उपयोग” की है, इससे ही आज सबसे अधिक पैदा हो रही है, इसलिए पूर्ण प्रतिबंध के बजाय स्मार्ट रेगुलेशन, जैसेकि ऑस्ट्रेलिया मॉडल का संशोधित रूप, यूरोपीय safety-by-design और भारत के डीपीडीपी ढांचे का प्रभावी क्रियान्वयन बेहतर है।
कुल मिलाकर कहें तो यही कहा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय संवैधानिक रूप से सही और व्यावहारिक रूप से विवेकपूर्ण है। बच्चों की सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन बनाए रखना भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनिवार्य है। यदि नियंत्रित, सुरक्षित और कौशल-उन्मुख इंटरनेट पहुंच सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य हो जाए तो यह न केवल बच्चों के हित में है, बल्कि देश की शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के हित में भी है।
पूर्ण प्रतिबंध या पूर्ण अनियंत्रण दोनों ही खतरनाक हैं। भारत को अपने युवा जनसांख्यिकीय लाभांश को सुरक्षित डिजिटल नागरिकों में बदलने के लिए इस संतुलित रास्ते पर चलना चाहिए। वैश्विक तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि जिम्मेदार डिजिटल बचपन ही भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मकता और समृद्धि की नींव है, इसलिए यह आज अत्यधिक आवश्यक हो गया है कि जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने जो सुझाव दिया है कि बच्चों को इंटरनेट के इस्तेमाल से पूरी तरह रोकने के बजाय सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए चाइल्ड मोड जैसे उपाय अपनाकर उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत किया जाना चाहिए। वह वास्तव में सही प्रतीत होता है। अब जरूरत समाज को इसके लिए तैयार होने की है।
(लेखिका, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं।)