स्थगन आदेश के बावजूद ‘अवैध रूप से’ गिरफ्तार व्यक्ति को 05 लाख रुपये का दें मुआवजा : हाईकोर्ट

स्थगन आदेश के बावजूद ‘अवैध रूप से’ गिरफ्तार व्यक्ति को 05 लाख रुपये का दें मुआवजा : हाईकोर्ट

स्थगन आदेश के बावजूद ‘अवैध रूप से’ गिरफ्तार व्यक्ति को 05 लाख रुपये का दें मुआवजा : हाईकोर्ट

प्रयागराज, 30 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को उस व्यक्ति को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसे हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बावजूद यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर ‘अवैध हिरासत’ में रखा था। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित एसएचओ के खिलाफ ‘आधिकारिक कर्तव्य के उचित निर्वहन में लापरवाही, इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश का उल्लंघन और अनुशासनहीनता का कृत्य करने’ के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाए।

मामले के अनुसार खंडपीठ अनिल सोनी (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याची का मामला यह था कि उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 69 (धोखाधड़ी से यौन संबंध बनाना) और अन्य धाराओं के साथ-साथ एससी-एसटी अधिनियम के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। एफआईआर उस महिला ने दर्ज कराई है जिसके साथ कथित तौर पर पिछले दो वर्षों से उसका प्रेम संबंध था। इस मामले में राहत पाने के लिए उन्होंने पहले एफआईआर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

एक अप्रैल को कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित कर उक्त एफआईआर में उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। हालांकि यह आदेश 6 अप्रैल को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया था, फिर भी संबंधित एसएचओ ने उन्हें 4 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया।

अपनी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में याची अनिल सोनी व अन्य ने बताया कि उसके भाई ने गिरफ्तारी के दिन एसएचओ को हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश की सूचना देने के लिए एक नोटरीकृत हलफनामा तैयार किया था। इसके अलावा, उनके वकील ने भी मोबाइल नंबरों के माध्यम से एसएचओ से संपर्क किया, लेकिन संबंधित अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी को खारिज कर दिया कि वह ‘तहसील दिवस’ पर हैं और अपने उच्च अधिकारियों से निर्देश मिलने के बाद ही कार्रवाई करेंगे।

हाईकोर्ट के समक्ष, एजीए ने याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को यह तर्क देते हुए उचित ठहराया कि एसएचओ अंतरिम स्थगन आदेश प्रस्तुत न किए जाने के कारण गिरफ्तारी करने के लिए बाध्य था। हालांकि, कोर्ट ने राज्य के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अंतरिम आदेश प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वकील की उपस्थिति में पारित किया गया था। अतः, पीठ ने माना कि सभी प्रतिवादी इस आदेश से पूरी तरह अवगत थे।

कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि प्रतिवादियों से जवाब मांगे जाने के बावजूद याचिका दायर करने के बाद भी याचिकाकर्ता नंबर 01 को जेल से रिहा नहीं किया गया था। वास्तव में, प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को उचित ठहराया था। इस मामले के तथ्यों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए, पीठ ने एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति’ की ओर इशारा किया।

खंडपीठ ने टिप्पणी की ‘हमने देखा है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति को और बल मिल रहा है। राज्य के वकील या तो इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों की सूचना पुलिस अधिकारियों को नहीं देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अधिकारी इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश का पालन नहीं करते हैं, या पुलिस अधिकारी न्यायालय के आदेशों के प्रति अनादरपूर्ण रवैया अपनाते हैं और दुर्भावनापूर्ण तरीके से कार्य करते हैं।’

न्यायालय ने गौर किया कि 13 अप्रैल को वर्तमान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर किए जाने और कई बार प्रतिवाद प्रस्तुत करने के लिए कहे जाने के बावजूद, प्रतिवादियों ने अंतरिम आदेश का पालन करने का कोई प्रयास नहीं किया। अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि सिद्धार्थ नगर के पुलिस अधीक्षक को 13 अप्रैल को पंजीकृत डाक द्वारा उनके घर पर अदालत के आदेश की एक प्रति प्राप्त होने के बावजूद याचिकाकर्ता को जेल से रिहा नहीं किया गया। दरअसल, याचिकाकर्ता को अंततः 29 अप्रैल को ही जेल से रिहा किया गया, वह भी हाईकोर्ट के हस्तक्षेप और सिद्धार्थ नगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को ऐसा करने का निर्देश देने के बाद।

खंडपीठ ने पाया कि संबंधित एसएचओ ने हाईकोर्ट के आदेश का पालन न करके अपने आधिकारिक कर्तव्य के उचित निर्वहन में लापरवाही बरती है और वह दंड का पात्र है। पीठ ने उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। राज्य को उससे मुआवजे की राशि (5 लाख रुपये) वसूल करने की भी स्वतंत्रता दी गई है। अब पीठ ने इस मामले की सुनवाई के लिए 13 जुलाई को तय की है और उस दिन संबंधित एसपी को याचिकाकर्ता को मुआवजे के भुगतान के संबंध में अनुपालन हलफनामा दाखिल करने के साथ-साथ एसएचओ के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही की सूचना देने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो सिद्धार्थ नगर के पुलिस अधीक्षक को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा।