मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने ओडिशा के बेल पणा और सुवर्णरेखा आम का किया उल्लेख

मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने ओडिशा के बेल पणा और सुवर्णरेखा आम का किया उल्लेख

मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने ओडिशा के बेल पणा और सुवर्णरेखा आम का किया उल्लेख

भुवनेश्वर, 31 मई । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ओडिशा के पारंपरिक ग्रीष्मकालीन पेय बेल पणा तथा प्रसिद्ध सुवर्णरेखा आम का उल्लेख करते हुए भारत की समृद्ध कृषि एवं सांस्कृतिक विरासत की सराहना की।

देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने नागरिकों से पर्याप्त मात्रा में पानी पीने, लंबे समय तक धूप में रहने से बचने तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की।

गर्मी से राहत पाने के पारंपरिक उपायों पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने वाले पेय पदार्थ न केवल स्वास्थ्यवर्धक हैं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विविधता के भी प्रतीक हैं। उन्होंने ओडिशा के बेल पणा का विशेष उल्लेख करते हुए उत्तर भारत के आम पन्ना, पंजाब एवं हरियाणा की लस्सी, राजस्थान और गुजरात की छाछ, बिहार एवं झारखंड के सत्तू शरबत तथा दक्षिण भारत के पणा कम, नीर मोर और संभारम जैसे पारंपरिक पेयों का भी जिक्र किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ये पेय पदार्थ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को साकार करते हैं और हमारे घरों तथा खेतों में उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जाते हैं। उन्होंने इनके सांस्कृतिक महत्व और पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ होने पर भी बल दिया।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने ग्रीष्म ऋतु के लोकप्रिय फल आम का भी उल्लेख किया और देश के किसानों की सराहना की। उन्होंने ओडिशा के सुवर्णरेखा आम के साथ-साथ महाराष्ट्र के अल्फांसो और हापुस, गुजरात के केसर, उत्तर प्रदेश के दशहरी, काशी के लंगड़ा, बिहार के जर्दालू तथा पश्चिम बंगाल के हिमसागर आम का जिक्र किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के गांवों में उत्पादित ये विशिष्ट फल अब सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंच रहे हैं, जिससे किसानों की आय बढ़ रही है और भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है।

कार्यक्रम के अंत में प्रधानमंत्री ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान प्रकृति से जुड़कर सीखने की अवधारणा पर भी चर्चा की। उन्होंने एक ऐसी ‘पाठशाला’ की कल्पना साझा की, जहां न तो कक्षाएं हों और न ही शुल्क, बल्कि नदियों और प्राकृतिक परिवेश के बीच अनुभवात्मक शिक्षा प्राप्त की जाए।