पांच साल के रिश्ते को ‘रेप’ नहीं माना जा सकता, हाईकोर्ट ने रद्द की पूरी आपराधिक कार्यवाही
पांच साल के रिश्ते को ‘रेप’ नहीं माना जा सकता, हाईकोर्ट ने रद्द की पूरी आपराधिक कार्यवाही
प्रयागराज, 18 जून। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म के आरोप से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आरोपित संजय सरोज को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ दाखिल चार्जशीट, सम्मन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से यह मामला दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले सहमति आधारित संबंध का प्रतीत होता है, जो बाद में विवाद में बदल गया।
मामले में वर्ष 2019 में प्रयागराज के कर्नलगंज थाने में दुष्कर्म, मारपीट, गाली गलौज और धमकी की धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि आरोपित ने वर्ष 2014 से शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि महिला और आरोपित करीब पांच वर्षों तक सम्पर्क में रहे और इस दौरान दोनों के बीच संबंध बने रहे। न्यायालय ने कहा कि एफआईआर में कथित दुष्कर्म की घटनाओं के समय, स्थान और परिस्थितियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। साथ ही महिला ने लंबे समय तक कोई शिकायत भी दर्ज नहीं कराई। अदालत की टिप्पणी थी कि उपलब्ध तथ्यों से यह एक “लव रिलेशनशिप के बिगड़ने” का मामला अधिक प्रतीत होता है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल शादी का वादा पूरा न होना अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनाता। यह साबित होना जरूरी है कि शुरुआत से ही शादी का वादा धोखे की नीयत से किया गया था और उसी आधार पर सहमति प्राप्त की गई थी।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद 27 अगस्त 2019 को दोनों का विवाह भी हुआ था। न्यायालय के अनुसार यह तथ्य भी इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राथमिकी विवाह के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई हो सकती है।
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से दुष्कर्म का प्रथमदृष्टया मामला नहीं बनता और मुकदमे की कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने 8 जनवरी 2020 की चार्जशीट, 4 सितम्बर 2021 के संज्ञान सम्मन आदेश तथा पूरे आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया।