त्रिपुराभैरवी मंदिर में त्रिपुरांतकर महादेव का लयबद्ध समर्पण के साथ रुद्राभिषेक
—एक वर्ष— एक संकल्प—एक रुद्राभिषेक
वाराणसी, 10 जुलाई। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में प्रतिदिन एक देवलिंग / देवविग्रह पर वैदिक रुद्राभिषेक का संकल्प लिया गया है। इसके लिए काशीखण्ड में वर्णित 335 वें दिव्य देवलिंग/देवविग्रह का श्रुति-सम्मत वेदोक्त विधि रुद्राभिषेक एवं सनातन तीर्थ-महिमा के लिए जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है। अभियान में शुक्रवार को त्रिपुरा भैरवी स्थित त्रिपुराभैरवी मंदिर में विराजित- त्रिपुरांतकर (त्रिपुरेश्वर) महादेव का वेद के स्वर-हरि-हर में लयबद्ध समर्पण के साथ रुद्राभिषेक किया गया।
इस अभियान के मुख्य संयोजक पं अजय शर्मा ने बताया कि काशी केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, अपितु एक जाग्रत दिव्य आध्यात्मिक यंत्र है। यहाँ पग-पग, तिल-तिल और कण-कण शिवमय है। इस पावन नगरी का प्रत्येक देवालय, प्रत्येक शिवस्वरूप तथा प्रत्येक तीर्थ अपने भीतर किसी न किसी दिव्य लीला, ब्रह्मांडीय रहस्य और आध्यात्मिक तत्त्व को समाहित किए हुए है। इन्हीं महिमामय रुद्रस्वरूपों में एक हैं - श्री त्रिपुरांतकर (त्रिपुरेश्वर) महादेव। शास्त्रों के अनुसार, तारकासुर के तीन पुत्र - 'तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली' ने ब्रह्माजी की घोर तपस्या कर स्वर्ण, रजत और लौह से निर्मित तीन अजेय पुरियों का वर प्राप्त किया। ये तीनों पुरियाँ आकाशमार्ग में विचरण करती थीं और सामूहिक रूप से त्रिपुरा कहलाती थीं।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन जब तीनों पुरियाँ एक ही रेखा में आईं, तब भगवान शिव ने अपने अचूक बाण से उनका संहार कर दिया। इस दिव्य विजय के कारण वे त्रिपुरांतक कहलाए। इसी महालीला की स्मृति में काशी में श्री त्रिपुरांतकर (त्रिपुरेश्वर) महादेव विराजमान हैं। पं. अजय के अनुसार, जो भी श्रद्धालु निष्कपट एवं श्रद्धापूर्ण भाव से श्री त्रिपुरांतकर लिंग का जलाभिषेक अथवा दर्शन करता है, उसके तीन जन्मों के संचित पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्री त्रिपुरांतकर महादेव के दर्शन का पुण्यफल अश्वमेध यज्ञ के समतुल्य माना गया है। इसी पावन तिथि पर भगवान विश्वेश्वर शिव ने देवताओं को भयमुक्त किया था। अतः इस दिन यहाँ दीपदान एवं विधिपूर्वक अर्चन करने से साधक के समस्त भय, पाप और अंतर्द्वंद्व का नाश होकर जीवन में आध्यात्मिक शान्ति एवं कल्याण की प्राप्ति होती है।