नाबालिगों के अपराधों में दोषसिद्धि पासपोर्ट जारी करने में बाधा नहीं : हाईकोर्ट
--हाईकोर्ट ने ‘भूल जाने के अधिकार’ और ‘नए सिरे से शुरुआत’ का हवाला दिया
प्रयागराज, 29 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा कि किसी व्यक्ति के किशोरावस्था में रहते हुए उसके खिलाफ दर्ज की गई दोष सिद्धि को किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 19 के तहत कानून के संचालन द्वारा पासपोर्ट जारी करने में कानूनी बाधा नहीं माना जा सकता है।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि किशोर अपराध के रिकॉर्ड को मिटाने या नष्ट करने के माध्यम से किशोर को प्राप्त ‘भूल जाने का अधिकार’ एक पूर्ण अधिकार है जो उन्हें ‘नई शुरुआत’ करने की अनुमति देता है।
इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ द्वारा मार्च 2021 में पारित एक आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता (मोहम्मद यूनुस अंसारी) को एक लम्बित आपराधिक मामले का हवाला देते हुए प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर पासपोर्ट देने से इनकार कर दिया गया था ।
मामले के अनुसार याची मोहम्मद यूनुस अंसारी ने 29 जनवरी, 2020 को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। अंततः 19 मार्च, 2021 को पासपोर्ट अधिकारियों द्वारा यह आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ लम्बित आपराधिक मामलों के अंतिम परिणाम के संबंध में एक नोटिस का जवाब नहीं दिया था।
अधिकारियों ने पाया कि याची को एक आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा था और उसे वर्ष 2010 से संबंधित बलात्कार और अपहरण के मामले में दोषी ठहराया गया था, जब वह केवल 16 वर्ष और 10 महीने का था। याची ने विवादित आदेश को चुनौती देते हुए 2021 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
पीठ को बताया गया कि गोरखपुर के किशोर न्याय बोर्ड द्वारा कानून के साथ संघर्ष करने वाले किशोर के रूप में उस पर मुकदमा चलाया गया था और अगस्त 2013 में उसे दोषी ठहराया गया था। हालांकि, बोर्ड ने याची को इस शर्त पर 6 महीने की परिवीक्षा पर रखा था कि वह अच्छा आचरण बनाए रखेगा।
इसके अलावा यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी प्रतिकूल रिपोर्ट के यह परिवीक्षा अवधि पूरी कर ली थी और उसे जिला परिवीक्षा अधिकारी द्वारा 20 मार्च, 2014 को चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया गया था। उनके वकील ने तर्क दिया कि किशोर न्याय बोर्ड द्वारा दी गई सजा पासपोर्ट देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती, क्योंकि किसी किशोर के खिलाफ दर्ज की गई सजा को याचिकाकर्ता के खिलाफ कलंक के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता है।
दूसरी ओर, भारत सरकार के वकील ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता पूर्व अपराधी है; इसलिए पासपोर्ट जारी करने के लिए आवेदन को अस्वीकार करना उचित था। न्यायालय ने आगे कहा कि किसी आपराधिक मामले के अस्तित्व में न होने के बावजूद उसे लम्बित दर्ज करना अधिकारियों की ओर से पूरी तरह से गैर-गंभीर रवैया दर्शाता है और यह ‘दिमाग का प्रयोग न करने का एक प्रमाण’ है।
हाईकोर्ट ने 2000 अधिनियम की धारा 19 का विस्तृत विश्लेषण किया, जिसमें यह देखा गया कि यह प्रावधान एक गैर-बाधा खंड से शुरू होता है, जो स्पष्ट रूप से बताता है कि अधिनियम के तहत निपटाए गए किशोर को किसी भी दोषसिद्धि से जुड़ी कोई अयोग्यता नहीं होगी। इसलिए, पीठ ने टिप्पणी की कि यदि किसी किशोर को दोषी ठहराया भी जाता है, तो यह दोषसिद्धि किसी भी तरह से उसके लिए हानिकारक नहीं हो सकती।
न्यायालय ने 2015 के किशोर न्याय अधिनियम की धारा 3(xiv) में निहित ‘नई शुरुआत’ के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसमें यह प्रावधान है कि किशोर न्याय प्रणाली के तहत किसी बच्चे के सभी पिछले रिकॉर्ड मिटा दिए जाने चाहिए।
पीठ ने किशोरों के लिए ‘भूल जाने के अधिकार’ के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, क्योंकि उसने कहा कि यदि किसी किशोर के आपराधिक इतिहास को बरकरार रहने दिया जाता है, तो इससे न केवल किशोर को अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है, बल्कि अन्य बातों के अलावा, किशोर की भविष्य की संभावनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विदेश यात्रा का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न अंग है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किशोर अवस्था के रिकॉर्ड को मिटा दिए जाने के आधार पर पासपोर्ट देने से इनकार करना संवैधानिक सीमा का उल्लंघन है।
इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता 2000 के अधिनियम की धारा 19 के तहत अनिवार्य कानून के संरक्षण का हकदार है। पीठ ने आगे कहा कि प्रतिवादी किशोर कानून में निहित ‘नई शुरुआत’ के सिद्धांत को पूरी तरह से लागू करने के लिए बाध्य हैं, ताकि अतीत के किशोर अपराध याचिकाकर्ता की भविष्य की संभावनाओं और पुनर्वास-पुनः एकीकरण को प्रभावित न करें।
कोर्ट ने प्रतिवादी-क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया कि गोरखपुर के किशोर न्याय बोर्ड द्वारा दर्ज की गई दोषसिद्धि के बावजूद, याचिकाकर्ता के पासपोर्ट जारी करने के आवेदन पर नए सिरे से कार्रवाई करें और यदि कोई अन्य कानूनी अड़चन-बाधा न हो तो उसे आवश्यक पासपोर्ट जारी करें। इसी के साथ कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली।
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