पत्नी भले ही शिक्षित व कमाने की क्षमता हो, वह पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है: हाईकोर्ट
पति का भरण-पोषण करने का दायित्व बना रहता है
प्रयागराज, 12 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि पत्नी पढ़ी-लिखी है या उसमें कमाने की क्षमता है, उसे दंप्रसं की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि जिस बात पर विचार किया जाना चाहिए, वह यह है कि क्या उसमें खुद का भरण-पोषण करने की वास्तविक और मौजूदा क्षमता है। वह भी उसी जीवन-स्तर के अनुसार, जिसका वह अपने वैवाहिक घर में सुख लेती थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि वह किसी लाभकारी रोज़गार में है और खुद का गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त आय कमा रही है, तब तक पति अपनी कानूनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता। महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के अधिकार का आंकलन पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल पत्नी की पिछली कमाई या शैक्षणिक योग्यताओं के आधार पर।
कोर्ट ने यह आदेश ने तब किया जब वह एक पत्नी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में पत्नी ने आगरा फ़ैमिली कोर्ट के फ़ैसले और आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण के तौर पर 15,000 रुपये देने का आदेश दिया गया था। याचिकाकर्ता ने इस राशि को बढ़ाने की मांग की थी।
दोनों पक्षकारों के बीच अगस्त 2014 में शादी हुई थी। याचिकाकर्ता-पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के एक महीने के भीतर ही उसे दहेज की गैर-कानूनी मांगों के चलते उसके वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। उसने दावा किया कि उसके पति (प्रतिवादी नंबर 2) ने बिना किसी उचित कारण के उसे छोड़ दिया। कहा गया कि आय होने के बावजूद उसने उसे कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी। दूसरी ओर, पति ने दावा किया कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी पर्याप्त कारण के उसे छोड़ दिया और उसके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया।
हाईकोर्ट के समक्ष पति ने यह तर्क दिया कि चूंकि पत्नी कोमल लखानी अत्यधिक पढ़ी-लिखी है, उसके पास एमबीए की डिग्री है और शादी से पहले वह एक लाभकारी रोज़गार में थी, इसलिए उसमें प्रति माह 50,000 रुपये से अधिक कमाने की क्षमता है। उसने आगे दावा किया कि वह स्वयं केवल 15,000 से 20,000 रुपये प्रति माह कमाता है। उस पर अपनी वृद्ध माँ के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी भी है।
बेंच ने चतुर्भुज बनाम सीता बाई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए यह नोट किया कि ‘खुद का गुज़ारा करने में असमर्थ’ अभिव्यक्ति का मतलब यह नहीं है कि पत्नी का पूरी तरह से बेसहारा होना ज़रूरी है। पत्नी की कमाने की क्षमता के बावजूद, पति का भरण-पोषण करने का दायित्व बना रहता है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि पति के अपनी खुद की आर्थिक असमर्थता के दावे बहुत ज्यादा संदिग्ध थे। कोर्ट ने उसकी आलीशान जीवनशैली, कनाडा में उसकी शिक्षा और एक शैक्षिक कंसल्टेंसी के साथ उसके जुड़ाव को ध्यान में रखा।
कोर्ट का यह भी मानना था कि पूरे वित्तीय रिकॉर्ड पेश करने में उसकी हिचकिचाहट और व्यावसायिक सम्पत्ति के संबंध में उसके टाल-मटोल वाले जवाबों ने उसकी दावा की गई आय की सच्चाई पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया। इसलिए बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला कि दोनों पक्षकारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देखते हुए, 15,000 रुपये की मासिक राशि का फैसला न तो न्यायसंगत था और न ही उचित।
इस प्रकार, आपराधिक पुनरीक्षण स्वीकार करते हुए सिंगल जज ने इस मामले को छह महीने के भीतर भरण-पोषण की राशि को फिर से निर्धारित करने के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया। इस बीच, पति को निर्देश दिया गया कि वह सभी मौजूदा बकाया राशि का भुगतान करे और जब तक इस मुद्दे पर फिर से फैसला नहीं हो जाता, तब तक मौजूदा राशि का नियमित रूप से भुगतान जारी रखे।