यौन उत्पीड़न के आरोपित एच आर आई वैज्ञानिक को राहत, कार्रवाई रद्द

पोश जांच में प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर हाईकोर्ट सख्त, नए सिरे से जांच का निर्देश

यौन उत्पीड़न के आरोपित एच आर आई वैज्ञानिक को राहत, कार्रवाई रद्द

प्रयागराज, 08 मई । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हरीश चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट (एचआरआई) के खगोल भौतिकी के प्रोफेसर डॉ. तपस कुमार दास के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) ने जांच के दौरान कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने फैसले में कहा कि जांच प्रक्रिया दोषपूर्ण थी क्योंकि शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं था, न ही आरोपित प्रोफेसर को जिरह या मौखिक सुनवाई का अवसर दिया गया।

मामला एचआरआई के एसोसिएट प्रोफेसर- डॉ. तपस कुमार दास से जुड़ा है, जो ब्लैक होल और एनालॉग ग्रैविटी के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनके खिलाफ पीएचडी छात्राओं और महिला शोधार्थियों ने यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार की कई शिकायतें दर्ज कराई थीं। आरोपों में देर रात कार्यालय बुलाना, आपत्तिजनक संदेश भेजना, अश्लील सामग्री साझा करना, यौन टिप्पणियां करना और अवांछित शारीरिक संपर्क जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।

आईसीसी ने अपनी जांच रिपोर्ट में डॉ. दास को “सीरियल हैरेसर” बताते हुए कहा था कि उन्होंने लंबे समय तक अपनी स्थिति और प्रभाव का दुरुपयोग कर छात्राओं का यौन और मानसिक उत्पीड़न किया। समिति ने वेतनवृद्धि रोकने, पदोन्नति पर रोक लगाने, छह माह निलंबन और महिला छात्रों को उनके अधीन कार्य करने से रोकने जैसी सिफारिशें की थीं।

इसके बाद एचआरआई की गवर्निंग काउंसिल ने जुलाई 2017 में डॉ. दास को “सेंसर” की सजा देते हुए उन्हें किसी भी महिला छात्रा, पीडीएफ या रिसर्च असिस्टेंट को मार्गदर्शन देने से प्रतिबंधित कर दिया था।

हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर डॉ. दास ने तर्क दिया कि शिकायतें कथित घटनाओं के कई वर्ष बाद दर्ज की गईं, जबकि पोश कानून की धारा 9 के तहत शिकायत तीन माह के भीतर और विशेष परिस्थितियों में अधिकतम छह माह के भीतर की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतों में घटनाओं की स्पष्ट तारीखें नहीं थीं और जांच पूरी तरह एकतरफा तरीके से की गई।

अदालत ने माना कि शिकायतों में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और प्रथम दृष्टया यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में देरी को हर स्थिति में शिकायत खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि कई बार छात्राएं या अधीनस्थ महिलाएं करियर प्रभावित होने के डर से तुरंत शिकायत नहीं कर पाती।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आईसीसी को पहले यह तय करना होगा कि शिकायतें समयसीमा के भीतर हैं या विलंब के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इस संबंध में एक कारणयुक्त आदेश पारित करना आवश्यक होगा।

कोर्ट ने 9 जुलाई 2017 का दंड आदेश रद्द करते हुए आईसीसी को निर्देश दिया कि वह सभी शिकायतों पर नए सिरे से विचार करे, शिकायतों की तारीख, कथित घटनाओं की समयावधि और देरी के कारणों की जांच करे। यदि समिति आगे जांच जारी रखने का निर्णय लेती है, तो उसे पोश कानून और नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना होगा। अदालत ने आईसीसी को आठ सप्ताह के भीतर नया निर्णय लेने का निर्देश दिया है।